असम, दार्जिलिंग चाय निर्यात पर पश्चिम एशिया संकट का दबाव

असम, दार्जिलिंग चाय निर्यात पर पश्चिम एशिया संकट का दबाव
चाय निर्यात पर संकट

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत की ऑर्थोडॉक्स चाय के निर्यात पर असर डाल रहा है, जिससे ऑर्डर घट रहे हैं, बीमा लागत बढ़ रही है और भुगतान को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। इसका सबसे ज्यादा दबाव असम और दार्जिलिंग जैसी प्रीमियम चाय श्रेणियों पर दिख रहा है, जो लंबे समुद्री मार्गों और पश्चिम एशियाई खरीदारों पर अधिक निर्भर रहती हैं।

हाइलाइट्स

  • पश्चिम एशिया संकट के कारण ऑर्थोडॉक्स चाय की खेपों को पहुंचने में 45-50 दिन लग रहे हैं, जिससे मांग और ऑर्डर दोनों घट रहे हैं।
  • लंबे ट्रांजिट समय, समुद्री बीमा प्रीमियम में वृद्धि और भुगतान सुरक्षा की कमी के चलते निर्यातकों की लागत और जोखिम बढ़े हैं।
  • चाय निर्यात मूल्य 2013-14 के 4,509 करोड़ रुपये से 2025-26 में 8,719 करोड़ रुपये तक पहुंचा है, पर उद्योग अब वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर रहा है।

ऑर्थोडॉक्स चाय कारोबार पर बढ़ता दबाव

ANI को गुवाहाटी टी ऑक्शन सेंटर के सचिव दिनेश बिहानी ने बताया कि पिछले डेढ़ महीने से ऑर्थोडॉक्स क्वालिटी चाय में पश्चिम एशिया संकट का असर साफ दिखने लगा है। उनके अनुसार, जो खेप पहले पश्चिम एशिया भेजी जाती थी, उसे अब पहुंचने में 45 से 50 दिन लग रहे हैं, जिससे मांग धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।

लंबा ट्रांजिट समय केवल लॉजिस्टिक्स लागत नहीं बढ़ा रहा, बल्कि समय-संवेदनशील खेपों के लिए डिलीवरी जोखिम भी बढ़ा रहा है। उद्योग के सामने अब छोटे ऑर्डर, ऊंचे समुद्री बीमा प्रीमियम और भुगतान सुरक्षा की कमी, तीनों चुनौतियां एक साथ खड़ी हैं।

बिहानी ने कहा कि यदि आने वाले महीनों में युद्ध जैसी स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो निर्यातकों को CTC ग्रेड की ओर लौटना पड़ सकता है या फिर चाय कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है। ऑर्थोडॉक्स चाय आम तौर on premium pricing पर बिकती है, इसलिए मार्ग बाधा और जोखिम लागत का असर इस खंड पर अधिक पड़ रहा है।

नए बाजारों की तलाश और व्यापक कारोबारी असर

उद्योग अब पश्चिम एशिया पर निर्भरता घटाने के लिए वैकल्पिक बाजारों की तलाश तेज कर रहा है। बिहानी ने कहा कि रूस एक बड़ा बाजार है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों से भी मांग संकेतों पर नजर रखी जा रही है।

यह दबाव ऐसे समय में आ रहा है जब भारत के चाय निर्यात ने हाल के वर्षों में मजबूत वृद्धि दर्ज की है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मई में कहा था कि चाय निर्यात का मूल्य 2013-14 के 4,509 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 8,719 करोड़ रुपये हो गया।

पश्चिम एशिया संकट का असर केवल चाय तक सीमित नहीं है, क्योंकि इससे ऊर्जा आपूर्ति, कच्चे तेल की लागत और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यापार मार्ग भी प्रभावित हो रहे हैं। इससे ईंधन कीमतों और महंगाई पर दबाव बढ़ रहा है, जबकि निर्यातकों के लिए सरकार के साथ समन्वय, बाजार विविधीकरण और व्यापार वित्त व्यवस्था को सुरक्षित रखना तत्काल प्राथमिकता बन रहा है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक के संदर्भ में बताया गया था कि पश्चिम एशिया में तनाव के बीच कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर रुपया और मानसून संबंधी अनिश्चितताएं मुद्रास्फीति व नीति-निर्णय के लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं। लेख में यह भी रेखांकित किया गया था कि ऊर्जा कीमतों में उछाल भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था पर लागत और महंगाई के जरिए दबाव बढ़ाता है, जबकि बाजार की नजर रेपो दर और आगे के संकेतों पर रहती है।

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