भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र 2030 तक 50 प्रक्षेपण लक्ष्य के लिए निजी ऑर्डर बढ़ाने पर निर्भर
भारत 2030 तक सालाना 50 प्रक्षेपण के लक्ष्य के साथ निजी कंपनियों को अंतरिक्ष विनिर्माण और प्रक्षेपण में बड़ी भूमिका दे रहा है। इस विस्तार की रफ्तार घरेलू मांग के साथ विदेशी ऑर्डर, निवेशक पूंजी और छोटे उपग्रह प्रक्षेपण वाहनों की व्यावसायिक तैनाती पर भी निर्भर करती है।
हाइलाइट्स
- भारत के प्रक्षेपण पोर्टफोलियो में एक साल के भीतर छह वाहन उपलब्ध होंगे, जिसमें Skyroot, HAL और Agnikul के नए वाहन शामिल हैं।
- Skyroot और HAL प्रत्येक कम से कम 10-12 प्रक्षेपण सालाना की क्षमता तक पहुंचने की योजना पर काम कर रहे हैं, जिसका 50 प्रक्षेपण लक्ष्य विदेशी ऑर्डर बुकिंग पर निर्भर है।
- अंतरिक्ष क्षेत्रों में पिछले एक साल में भारतीय निजी स्टार्टअप्स की ऑर्डर बुक करोड़ों डॉलर तक पहुंची और 2,200 करोड़ रुपये R&D फंडिंग का 40 प्रतिशत, यानी 800 करोड़ रुपये, 6-9 महीनों में आया।
प्रक्षेपण क्षमता बढ़ाने की रूपरेखा
Forbes India के साथ बातचीत में IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका ने कहा कि भारत करीब एक साल के भीतर तीन छोटे उपग्रह प्रक्षेपण वाहनों के साथ वाणिज्यिक तैनाती की स्थिति में पहुंच रहा है, जबकि मौजूदा PSLV, LVM3 और GSLV Mk II के साथ देश का प्रक्षेपण पोर्टफोलियो छह वाहनों तक पहुंच जाएगा। उनके मुताबिक Skyroot का वाहन पहले से तैनात है, HAL निर्मित वाहन एक साल में उपलब्ध होगा और Agnikul का वाहन इससे भी कम समय में तैयार हो सकता है।गोयनका ने कहा कि 50 प्रक्षेपण सालाना का लक्ष्य आसान नहीं है, लेकिन हासिल किया जा सकता है, बशर्ते मांग केवल भारत से नहीं बल्कि विदेशों से भी आए। उन्होंने कहा कि Skyroot और HAL दोनों अपने ऑर्डर बुक को लेकर आश्वस्त हैं और प्रत्येक कम से कम 10 से 12 प्रक्षेपण सालाना तक पहुंच सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि IN-SPACe बाजार की प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि किसी खिलाड़ी को अनुचित लागत लाभ न मिले। उदाहरण के तौर पर, प्रक्षेपण केंद्र के उपयोग या इसरो से खरीदे जाने वाले घटकों, जैसे पहले चरण के सॉलिड मोटर, की कीमत सभी के लिए समान रखी जाएगी।
वैश्विक मांग और निवेश का असर
गोयनका के अनुसार भारतीय निजी अंतरिक्ष कंपनियां देर से शुरुआत करने के बावजूद तेजी से वैश्विक प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही हैं और कुछ स्टार्टअप पहले ही भारत के बाहर से ऑर्डर जीत रहे हैं। उन्होंने Skyroot, XDLINX और Digantara का जिक्र करते हुए कहा कि विदेशी ग्राहकों के लिए प्रक्षेपण और स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस सेवाएं अब शुरुआती पायलट चरण से आगे बढ़ रही हैं।उनके मुताबिक पिछले एक साल में भारतीय निजी स्पेस टेक स्टार्टअप्स की ऑर्डर बुक करोड़ों डॉलर के स्तर तक पहुंच चुकी है और अगले 12 महीनों में इसमें कई गुना वृद्धि हो सकती है। उन्होंने कहा कि करीब डेढ़ साल पहले तक निजी क्षेत्र के पास बेचने के लिए बहुत कम था, लेकिन अब कंपनियां विदेशों में ग्राहक हासिल करने के लिए सक्रिय व्यावसायिक विकास अभियान चला रही हैं।
फंडिंग के मोर्चे पर गोयनका ने कहा कि पिछले 18 महीनों में निवेशकों की जिज्ञासा वास्तविक निवेश में बदल रही है और क्षेत्र Series A से आगे बड़े निवेश दौर देख रहा है। उनके अनुसार शीर्ष 10 स्टार्टअप्स या तो 20 मिलियन डॉलर से अधिक के फंडिंग राउंड पूरे कर चुके हैं या उनके करीब हैं, जबकि घरेलू और विदेशी पूंजी का अनुपात अब लगभग आधा-आधा है।
उन्होंने RDI फंडिंग को भी बड़ा प्रोत्साहन बताया और कहा कि घोषित 2,200 करोड़ रुपये में से करीब 40 प्रतिशत, यानी 800 करोड़ रुपये से अधिक, पिछले 6 से 9 महीनों में अंतरिक्ष क्षेत्र में गया है। उनके मुताबिक अनुदान के रूप में आने वाली यह पूंजी निजी निवेशकों के लिए क्षेत्र को और आकर्षक बनाती है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में भारत के सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की रणनीति पर चर्चा की गई थी, जिसमें विनिर्माण, चिप डिजाइन और सामग्री आपूर्ति में बाहरी निर्भरता घटाने पर जोर था। इसमें यह भी बताया गया था कि 2nm और 3nm जैसे उन्नत चिप डिजाइन भारत में विकसित हो रहे हैं और सेमीकंडक्टर कार्यक्रम के अगले चरण में सामग्री व इनपुट पर निवेश बढ़ाया जा रहा है। कुल मिलाकर, लेख का फोकस तकनीकी संप्रभुता, आपूर्ति शृंखला लचीलापन और दीर्घकालिक मांग/व्यावसायिक व्यवहार्यता के बीच संतुलन पर था।
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