भारत में एलपीजी आपूर्ति पर बहस तेज, ऊर्जा सुरक्षा पर ओवैसी ने उठाए सवाल
केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार देश में एलपीजी की पर्याप्त उपलब्धता है और घबराहट में बुकिंग अब नहीं हो रही, लेकिन आपूर्ति को लेकर चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसी पृष्ठभूमि में हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ऊर्जा आयात, सामरिक भंडार और खाड़ी क्षेत्र पर भारत की निर्भरता को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगते हैं. यह बहस ऐसे समय में सामने आती है जब औद्योगिक डीजल की कीमत में 25 प्रतिशत वृद्धि का भी उल्लेख किया गया है.
हाइलाइट्स
- ओवैसी ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा कि गैस भंडार सीमित हैं और आयात निर्भरता आपूर्ति जोखिम बढ़ाती है।
- सरकारी जवाब में कहा गया कि देशभर में एलपीजी की कोई कमी नहीं है, जबकि 55 लाख एलपीजी बुकिंग दर्ज होने से उपभोक्ता मांग स्थिर बनी है।
- औवैसी ने क्षेत्रीय तनाव और औद्योगिक डीजल कीमत 87.67 रुपये से 109.59 रुपये प्रति लीटर पहुंचने पर आर्थिक दबाव तथा व्यापार मार्गों के जोखिम को रेखांकित किया।
एलपीजी आपूर्ति, आयात निर्भरता और भंडार पर सवाल
ओवैसी अपने भाषण में कहते हैं कि भारत खुद को आत्मनिर्भर बताता है, लेकिन गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है और तेल तथा गैस की आपूर्ति स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर आती है। वह दावा करते हैं कि देश में गैस कमी की स्थिति चिंता पैदा करती है और सरकार को रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की वास्तविक स्थिति पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उनके अनुसार भारत के पास सीमित दिनों का एसपीआर है, जबकि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को जोड़ने पर कुल कवरेज अलग तस्वीर दिखाती है। यह तर्क ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला जोखिम और आयात लागत जैसे व्यापक आर्थिक मुद्दों को केंद्र में लाता है.सरकारी पक्ष से सुजाता शर्मा कहती हैं कि एलपीजी की सप्लाई में कोई कमी नहीं है और देशभर में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। उनके मुताबिक एक दिन पहले 55 लाख एलपीजी बुकिंग दर्ज हुईं और पैनिक बुकिंग की प्रवृत्ति अब कम हुई है। हालांकि वह यह भी स्वीकार करती हैं कि एलपीजी का मुद्दा अब भी चिंताजनक बना हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि बाजार में उपलब्धता और उपभोक्ता मनोविज्ञान, दोनों पर नजर रखी जा रही है.खाड़ी क्षेत्र, रेमिटेंस और आर्थिक असर
ओवैसी अपने संबोधन में खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों का मुद्दा भी उठाते हैं और कहते हैं कि दुबई, अबू धाबी, दोहा और कुवैत जैसे केंद्रों से आने वाला धन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अहम है। उनके मुताबिक यदि उन अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ता है, तो वहां काम कर रहे भारतीयों की वापसी का जोखिम पैदा हो सकता है। यह टिप्पणी भारत की बाहरी आय, प्रवासी श्रम और पश्चिम एशिया से जुड़े आर्थिक रिश्तों के महत्व को रेखांकित करती है। ऊर्जा आपूर्ति में बाधा और क्षेत्रीय तनाव, दोनों का असर घरेलू कीमतों और रोजगार प्रवाह पर पड़ सकता है.इसी संदर्भ में औद्योगिक डीजल की कीमत 87.67 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 109.59 रुपये प्रति लीटर होने का उल्लेख लागत दबाव की ओर इशारा करता है। ईंधन महंगा होने से परिवहन, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इसका असर अंततः औद्योगिक खर्च और उपभोक्ता कीमतों पर दिखाई दे सकता है। इसलिए एलपीजी उपलब्धता का प्रश्न केवल घरेलू उपभोग तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक कारोबारी माहौल से भी जुड़ा है.भाषण में पाकिस्तान और क्षेत्रीय अस्थिरता का संदर्भ
हैदराबाद की जनसभा में ओवैसी पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी करते हैं और अफगानिस्तान में कथित सैन्य कार्रवाई का जिक्र करते हैं। वह पाकिस्तान पर इस्लामी मूल्यों का दावा करने के बावजूद पड़ोसी क्षेत्र में रक्तपात बढ़ाने का आरोप लगाते हैं। अपने भाषण में वह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की अस्थिरता के बीच समानता खींचते हैं और कहते हैं कि ऐसे हालात पड़ोसी देशों में शांति को कमजोर करते हैं। यह राजनीतिक हमला घरेलू नीति बहस के साथ अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक जोखिम को भी जोड़ता है.उनकी टिप्पणी का आर्थिक पहलू यह है that क्षेत्रीय तनाव ऊर्जा व्यापार मार्गों, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, पर असर डाल सकता है। यदि आपूर्ति मार्ग बाधित होते हैं, तो भारत जैसे आयातक देश के लिए लागत और उपलब्धता दोनों चुनौती बन सकते हैं। इसी कारण उनके भाषण में विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू आर्थिक संवेदनशीलता एक साथ दिखाई देती है।हमने पहले Schlumberger (SLB) के शेयर में हालिया उतार-चढ़ाव और इसके पीछे के प्रमुख ट्रिगर्स पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि OneSubsea के जरिए मिले नए डीपवाटर कॉन्ट्रैक्ट, लाभांश वृद्धि और संस्थागत होल्डिंग में बदलाव के बावजूद स्टॉक शॉर्ट- और मिड-टर्म एवरेज से नीचे दबाव में बना हुआ है, जबकि दीर्घकालिक तकनीकी संरचना तुलनात्मक रूप से मजबूत दिखती है।
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