भारत के विनिर्माण क्षेत्र में नियुक्त श्रमिक हिस्सेदारी घटी
सरकारी तिमाही सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, भारत के असंगठित उद्यम क्षेत्र में अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही में वेतनभोगी कर्मचारियों पर निर्भरता घटती है और कामकाजी मालिकों की हिस्सेदारी बढ़ती है। आंकड़े दिखाते हैं कि सभी श्रेणियों के श्रमिकों में नियुक्त श्रमिकों का हिस्सा 25.9 प्रतिशत से घटकर 23.9 प्रतिशत हो जाता है, जबकि कामकाजी मालिकों का हिस्सा 60 प्रतिशत से बढ़कर 62 प्रतिशत हो जाता है। यह बदलाव संकेत देता है कि छोटे और अनौपचारिक कारोबार श्रम लागत पर नियंत्रण रखने के लिए मालिक-चालित परिचालन मॉडल की ओर अधिक झुकते हैं।
हाइलाइट्स
- अक्टूबर-दिसंबर 2025 में नियुक्त श्रमिक रखने वाले प्रतिष्ठानों की हिस्सेदारी 13.4 प्रतिशत से घटकर 12.7 प्रतिशत हो गई।
- विनिर्माण में नियुक्त श्रमिकों की हिस्सेदारी 27.3 प्रतिशत से गिरकर 23 प्रतिशत और कामकाजी मालिकों की हिस्सेदारी 61 प्रतिशत से बढ़कर 65.4 प्रतिशत पहुंची।
- वेतनभोगी श्रम हिस्सेदारी घटने से असंगठित क्षेत्र में रोजगार वृद्धि स्व-रोजगार पर केंद्रित हो सकती है, जिससे आय स्थिरता और गुणवत्ता प्रभावित होगी।
अक्टूबर-दिसंबर 2025 में श्रम ढांचे में बदलाव
जुलाई-सितंबर 2025 की तुलना में अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही में ऐसे प्रतिष्ठानों की हिस्सेदारी भी घटती है जो नियुक्त श्रमिक रखते हैं। सभी प्रतिष्ठानों में यह अनुपात 13.4 प्रतिशत से घटकर 12.7 प्रतिशत पर आता है। इसी दौरान 'अन्य' श्रेणी, जिसमें अवैतनिक पारिवारिक सदस्य शामिल हैं, 14 प्रतिशत पर स्थिर रहती है। इससे संकेत मिलता है कि बदलाव मुख्य रूप से वेतनभोगी श्रमिकों और कामकाजी मालिकों के बीच हो रहा है, न कि पारिवारिक श्रम के विस्तार से।
यह रुझान बताता है कि असंगठित और छोटे व्यवसाय विस्तार की बजाय संचालन को आत्मनिर्भर ढांचे में समेटते हैं। कारोबार अपने पेरोल को बढ़ाने के बजाय मालिक की प्रत्यक्ष भागीदारी से गतिविधियां चलाते हैं। लेख में दिए गए संकेतों के अनुसार, यह दबा हुआ मांग माहौल या घटते मार्जिन से जुड़ा हो सकता है।
विनिर्माण और व्यापार में सबसे तेज गिरावट
क्षेत्रवार आंकड़ों में विनिर्माण सबसे अधिक दबाव में दिखता है। नियुक्त श्रमिक रखने वाले विनिर्माण प्रतिष्ठानों की हिस्सेदारी 11.4 प्रतिशत से घटकर 10.5 प्रतिशत हो जाती है, जो एक तिमाही में लगभग एक प्रतिशत अंक की गिरावट है। व्यापार प्रतिष्ठानों में भी यह अनुपात 16.3 प्रतिशत से फिसलकर 15.4 प्रतिशत पर आता है, जबकि अन्य सेवाओं में गिरावट अपेक्षाकृत सीमित रहकर 12.7 प्रतिशत से 12.4 प्रतिशत तक रहती है।
विनिर्माण क्षेत्र के भीतर श्रमिक संरचना का बदलाव और अधिक स्पष्ट है। यहां नियुक्त श्रमिकों की हिस्सेदारी 27.3 प्रतिशत से घटकर 23 प्रतिशत पर आती है। इसके विपरीत कामकाजी मालिकों की हिस्सेदारी 61 प्रतिशत से बढ़कर 65.4 प्रतिशत हो जाती है, जिससे संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में उद्यम मालिक सीधे उत्पादन और संचालन में अधिक भूमिका निभाते हैं।
लागत दबाव और असंगठित क्षेत्र पर असर
विनिर्माण में वेतनभोगी श्रम हिस्सेदारी का सिकुड़ना बताता है कि छोटे उद्यम लागत प्रबंधन को प्राथमिकता देते हैं। लेख में कहा गया है कि इसके पीछे कमजोर ऑर्डर बुक या बढ़ती परिचालन लागत जैसे कारक हो सकते हैं, हालांकि सर्वेक्षण इसके कारणों को सीधे दर्ज नहीं करता। तिमाही आधार पर बदलाव में मौसमी कारकों की भी कुछ भूमिका हो सकती है।
व्यापक स्तर पर यह प्रवृत्ति रोजगार गुणवत्ता और आय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मालिक-आधारित मॉडल आम तौर पर औपचारिक भर्ती की गति को सीमित करते हैं। यदि यह रुझान जारी रहता है, तो असंगठित क्षेत्र में रोजगार वृद्धि अधिकतर स्व-रोजगार आधारित रह सकती है, न कि वेतनभोगी नौकरियों के विस्तार पर। इसका असर विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर पड़ता है जहां छोटे विनिर्माण और व्यापार इकाइयां स्थानीय श्रम बाजार का बड़ा हिस्सा बनाती हैं।
हमने पहले वित्त विधेयक 2026 पर चर्चा के दौरान सरकार के भरोसा-आधारित कर प्रशासन, अनुपालन बोझ घटाने और एमएसएमई व निवेश माहौल को समर्थन देने वाले कदमों पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में टीसीएस में कटौती, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के सरलीकरण और समग्र राजकोषीय संकेतकों के जरिए नीति दिशा को रेखांकित किया गया था, जो आगे चलकर वास्तविक अर्थव्यवस्था और रोजगार से जुड़े रुझानों को समझने के लिए पृष्ठभूमि देता है।
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