लोकसभा में पिछले सप्ताह पेश किए गए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, एफसीआरए, संशोधन विधेयक पर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है, और एम.के. स्टालिन ने एक्स पर इसे अल्पसंख्यक संस्थानों पर सीधा प्रहार बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इसे पूरी तरह वापस लेने की मांग की है. यह विवाद ऐसे समय में सामने है जब केरल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव प्रचार अंतिम चरण में है, जिससे इस बहस का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है.
हाइलाइट्स
- एफसीआरए संशोधन विधेयक के पारित होने की संभावना मौजूदा बजट सत्र में कम दिख रही है क्योंकि बुधवार को लोकसभा में बहस टल गई।
- विधेयक पास होने पर दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु और केरल की अल्पसंख्यक शैक्षिक, धार्मिक, सामाजिक संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और अनुपालन लागत प्रभावित हो सकती है।
- डीएमके और विपक्षी नेता केंद्र पर अल्पसंख्यकों की चिंताओं की अनदेखी का आरोप लगा रहे हैं, जिससे चुनावी राज्यों में विधेयक के विरोध को समर्थन मिल रहा है।
विधेयक के प्रावधान और संसदीय स्थिति
प्रस्तावित विधेयक 2010 के विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन करना चाहता है और सरकार इसका उद्देश्य विदेशी चंदे में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना बता रही है. उपलब्ध विवरण के अनुसार, एफसीआरए के तहत पंजीकृत लगभग 16,000 संघ हर वर्ष करीब 22,000 करोड़ रुपये प्राप्त करते हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि बदलावों से गैर सरकारी संगठनों पर सरकारी नियंत्रण अधिक केंद्रीकृत होगा और इसका असर विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़ी संस्थाओं पर पड़ेगा. बुधवार को लोकसभा में इस पर बहस टल गई और मौजूदा बजट सत्र में इसके पारित होने की संभावना कम दिखाई दे रही है.चुनावी राजनीति में मुद्दे की अहमियत
केरल के विपक्षी सांसदों ने संसद में विधेयक के प्रावधानों के खिलाफ नारेबाजी की, जबकि केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी केंद्र पर अल्पसंख्यक समुदायों की चिंताओं की अनदेखी का आरोप लगा रहे हैं. तमिलनाडु में स्टालिन का रुख उनकी पार्टी की व्यापक चुनावी रणनीति के अनुरूप दिखता है, जिसमें केंद्र बनाम राज्य की राजनीतिक रेखा को प्रमुखता दी जा रही है. डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन हाल के दिनों में चुनाव को तमिलनाडु बनाम दिल्ली की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं, और मुख्यमंत्री ने भी भाजपा नीत गठबंधन पर राज्य की पहचान को लेकर तीखा हमला बोला है. चूंकि तमिलनाडु में ईसाई और मुस्लिम आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा परंपरागत रूप से डीएमके नीत गठबंधन के साथ जुड़ता रहा है, इसलिए एफसीआरए विवाद चुनावी विमर्श में संवेदनशील मुद्दा बन रहा है.क्षेत्रीय और संस्थागत असर
अगर विधेयक आगे बढ़ता है तो इसका असर उन शैक्षिक, धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं पर पड़ सकता है जो विदेशी सहायता पर आंशिक रूप से निर्भर हैं. इससे दक्षिण भारत, खासकर केरल और तमिलनाडु में, अल्पसंख्यक संस्थानों की फंडिंग व्यवस्था और अनुपालन लागत पर नई बहस तेज हो सकती है. दूसरी ओर, संसद में फिलहाल आई रुकावट यह संकेत देती है कि चुनावी राज्यों में राजनीतिक प्रतिरोध इस विधायी प्रक्रिया की समयसीमा को प्रभावित कर रहा है. बजट सत्र गुरुवार को समाप्त होने की संभावना है, हालांकि इस महीने बाद में दो या तीन अतिरिक्त बैठकें होने के संकेत भी दिए गए हैं.हमने पहले लोकसभा में पेश विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 पर बढ़ते राजनीतिक टकराव और केरल में इसके चुनावी असर पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रस्तावित बदलावों के तहत रद्द/समाप्त या सरेंडर FCRA पंजीकरण वाली संस्थाओं के विदेशी फंड और संपत्तियों का नियंत्रण नामित प्राधिकरण को दिया जा सकता है, जिस पर विपक्ष ने अल्पसंख्यक और सामाजिक-धार्मिक संस्थानों पर केंद्रीकृत सरकारी नियंत्रण बढ़ने की आशंका जताई थी।
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