आप राज्यसभा टूट पर कानूनी जोखिम बढ़ा, भाजपा में शामिल हुए सांसदों की अयोग्यता पर सवाल
दिल्ली और पंजाब की राजनीति में नया तनाव तब उभरता है जब आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के कथित समूह परिवर्तन को दल-बदल कानून की कसौटी पर परखा जा रहा है। विवाद का केंद्र यह है कि दो-तिहाई संख्या का दावा क्या भाजपा में जाने को वैध विलय का संरक्षण देता है, या इससे पहले सार्वजनिक रूप से पार्टी बदलना तत्काल अयोग्यता का आधार बनता है।
हाइलाइट्स
- आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में 10 में से 7 सांसदों ने भाजपा में विलय का दावा पेश किया, जिससे कानूनी अयोग्यता का सवाल उठा।
- दो-तिहाई विधायी दल का समर्थन मिलने के बावजूद, अंतिम निर्णय राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन के विवेक और प्रक्रिया के क्रोनोलॉजी पर निर्भर करेगा।
- आप की मुख्य शिकायत अभी तीन सांसदों—राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल—पर केंद्रित है, जिनकी सार्वजनिक भाजपा जॉइनिंग ने विवाद को तेज किया।
विलय दावे और कानूनी प्रक्रिया
FinancialExpress.com के अनुसार, राघव चड्ढा ने शुक्रवार को तीन अन्य राज्यसभा सांसदों के साथ आधिकारिक रूप से भाजपा में शामिल होने की घोषणा की, जबकि उन्होंने दावा किया कि कुल सात आप सांसद पार्टी छोड़ चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सात सांसदों में संदीप पाठक, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी के नाम शामिल हैं, जिससे राज्यसभा में आप के 10 में से 7 सांसदों का समूह बनता है।
यही संख्या कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि दसवीं अनुसूची के तहत राज्यसभा सदस्य अयोग्यता से बच सकते हैं यदि उनकी मूल राजनीतिक पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय मान्य हो। इसके लिए विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति आवश्यक मानी जाती है, और सदस्य या तो नई पार्टी में जा सकते हैं या अलग समूह के रूप में काम कर सकते हैं।
लेकिन इस प्रक्रिया में एक अहम शर्त यह भी है कि विलय का दावा केवल संख्या के आधार पर स्वतः मान्य नहीं हो जाता। अंतिम निर्णय राज्यसभा के सभापति, फिलहाल उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, के पास है, और संविधान इस तरह की अयोग्यता याचिका पर फैसला देने की कोई समयसीमा तय नहीं करता।
रिपोर्ट में 2019 के तेलुगु देशम पार्टी प्रकरण का भी उल्लेख है, जब राज्यसभा में उसके 6 में से 4 सांसद भाजपा में गए थे और तत्कालीन सभापति एम. वेंकैया नायडू ने संवैधानिक सीमा पूरी होने पर विलय को स्वीकार किया था। हालांकि, बाद के न्यायिक फैसलों, खासकर शिवसेना विभाजन पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों, ने यह प्रश्न खुला छोड़ा है कि क्या केवल विधायी दल संगठनात्मक पार्टी से अलग होकर स्वतंत्र रूप से ऐसा कदम उठा सकता है।
आप की आपत्ति और राजनीतिक असर
आम आदमी पार्टी ने इस घटनाक्रम को भाजपा की कथित "ऑपरेशन लोटस" रणनीति बताया है और इसे पंजाब की भगवंत मान सरकार को अस्थिर करने की कोशिश के रूप में पेश किया है। वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने कहा है कि किसी भी तरह का विभाजन या गुटबंदी राज्यसभा और लोकसभा में कानूनी मान्यता नहीं रखती, और उन्होंने सात सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग करते हुए सभापति को लिखने की बात कही है।एएनआई के हवाले से पार्टी सूत्रों ने कहा कि आप के मुख्य सचेतक एन.डी. गुप्ता राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल के खिलाफ पत्र देंगे, क्योंकि ये तीनों भाजपा कार्यालय में सार्वजनिक रूप से शामिल होते दिखे। सूत्रों के मुताबिक बाकी चार सांसद सार्वजनिक रूप से उस मंच पर नहीं दिखे, इसलिए प्रारंभिक शिकायत उन्हीं तीन नामों पर केंद्रित रहेगी।
विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा समयक्रम है। कानूनी तर्क यह कहता है कि यदि किसी सांसद ने दो-तिहाई समूह द्वारा औपचारिक विलय घोषित होने से पहले दूसरी पार्टी जॉइन कर ली, तो उसे स्वेच्छा से मूल दल की सदस्यता छोड़ना माना जा सकता है, जो पैराग्राफ 2 के तहत तत्काल अयोग्यता का आधार है। दूसरी ओर, समूह का दावा है कि औपचारिक दस्तावेज और हस्ताक्षरित पत्र 24 अप्रैल की सुबह ही राज्यसभा सभापति को सौंप दिए गए थे, और उसके बाद ही भाजपा मंच पर उपस्थिति हुई।
इसलिए आगे की दिशा अब संसदीय पीठासीन प्राधिकारी की व्याख्या और संभावित न्यायिक चुनौती पर निर्भर करती है। फैसला न केवल आप और भाजपा के बीच संसदीय शक्ति-संतुलन को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट कर सकता है कि ऊपरी सदन में दो-तिहाई समूह आधारित विलय की सीमा व्यवहार में कितनी व्यापक है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में AAP के राज्यसभा सांसदों के BJP में शामिल होने के दावों और उससे राज्यसभा में शक्ति-संतुलन पर पड़ने वाले असर पर चर्चा की गई थी। उसमें यह भी बताया गया था कि AAP ने दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत राघव चड्ढा समेत कुछ सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की मांग तेज की, जबकि चड्ढा के पुराने BJP-विरोधी बयानों के फिर से सामने आने से राजनीतिक विवाद और गहरा गया।
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