भारत के चुनावी ढांचे को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को वैध ठहराया
भारत में मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चल रही कानूनी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण, SIR, को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया। यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि इससे देशभर में मतदाता सूचियों के व्यापक पुनरीक्षण के लिए चुनाव आयोग के अधिकार को न्यायिक समर्थन मिलता है।
हाइलाइट्स
- सुप्रीम कोर्ट ने 24 जून 2025 के ECI आदेश और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया की वैधता पर सभी याचिकाओं को खारिज किया।
- अदालत ने माना SIR जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन नहीं करता और चुनावी सूची की शुद्धता के लिए कानूनी आधार सुनिश्चित करता है।
- ECI ने बताया SIR बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, पश्चिम बंगाल में पूरा, यूपी, गुजरात, राजस्थान में जारी है और तीसरे चरण में देशभर में लागू होगा।
अदालती फैसला और चुनौती का दायरा
Financial Express के अनुसार, सुप्रीम Court ने बुधवार को उन याचिकाओं के समूह को खारिज कर दिया जिनमें Election Commission of India, ECI, की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर पूरी प्रक्रिया को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि कानून में निर्धारित कुछ प्रक्रियात्मक तौर-तरीकों का कड़ाई से पालन नहीं हुआ।
तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant कर रहे थे और जिसमें न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi तथा VM Pancholi शामिल थे, ने 29 जनवरी को विस्तृत दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। पीठ ने माना कि SIR, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन नहीं करता और यह चुनावों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती देता है।
याचिकाओं में चुनाव आयोग के 24 जून 2025 के आदेश और उससे जुड़ी दिशानिर्देशों को रद्द करने की मांग की गई थी। Association for Democratic Reforms, People’s Union for Civil Liberties, राजनीतिक कार्यकर्ता Yogendra Yadav, सांसद Mahua Moitra, Manoj Jha, K C Venugopal, Supriya Sule, Mujahid Alam और National Federation for Indian Women सहित कई पक्षकार इस मामले में अदालत पहुंचे थे।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 के साथ-साथ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 का उल्लंघन करता है। उनका कहना था कि इस अभ्यास से पात्र मतदाता मताधिकार से वंचित हो सकते हैं और इसमें पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपाय नहीं हैं।
राज्यों में असर और चुनावी प्रशासन पर प्रभाव
इस विवाद की पृष्ठभूमि तब बनी जब चुनाव आयोग ने उन मतदाताओं से, जिनके नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूचियों में नहीं थे, उन रिकॉर्ड में दर्ज व्यक्तियों से वंशानुगत संबंध का प्रमाण देने को कहा। आयोग ने यह भी कहा कि Aadhaar card और voter ID card को नागरिकता के अंतिम प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।अदालत ने इससे पहले 28 जुलाई को बिहार में SIR के बाद 1 अगस्त 2025 को प्रस्तावित मसौदा मतदाता सूची के प्रकाशन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान से जुड़े मामले में सभी राजनीतिक दलों को भी पक्षकार बनाया था।
चुनाव आयोग ने अदालत में यह रुख रखा कि SIR एक वैध और कानूनी तंत्र है, जिसका उपयोग पहले भी कई राज्यों में मतदाता सूचियों की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में यह अभी जारी है।
आयोग के अनुसार, तीसरे चरण में इस पुनरीक्षण को देशभर में आगे बढ़ाया जाना है, हालांकि हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख इस चरण में शामिल नहीं होंगे। यह फैसला चुनावी प्रशासन, राजनीतिक दलों और मतदाता पंजीकरण व्यवस्था के लिए व्यापक प्रभाव रखता है, क्योंकि अब मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर आयोग की कार्यवाही को मजबूत कानूनी आधार मिल गया है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल की नई BJP सरकार के शुरुआती फैसलों और आक्रामक कल्याण योजनाओं—जैसे महिलाओं को मासिक नकद सहायता और रियायती मछली-भात भोजन—का ब्यौरा दिया गया था। लेख में इन कदमों के साथ राज्य के बढ़ते कर्ज, debt-to-GSDP दबाव और राजकोषीय स्थिरता पर उठ रहे सवालों को भी रेखांकित किया गया था, जिससे नीति निर्णयों के प्रशासनिक व वित्तीय निहितार्थ समझ में आते हैं।
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