भारतीय शेयर बाजार में ऊंचे वैल्यूएशन और कमजोर रिटर्न के बीच पूंजी की लागत पर बहस तेज है। निवेशक शंकर शर्मा का कहना है कि घरेलू पूंजी के सीमित विकल्प और विदेशी पूंजी की वैश्विक गतिशीलता ने बाजार की कीमतों और वास्तविक आय क्षमता के बीच बड़ा अंतर पैदा किया है।
हाइलाइट्स
- भारतीय शेयर बाजार में ऊंची पूंजी लागत, 7 प्रतिशत जोखिम-मुक्त दर और 5-6 प्रतिशत जोखिम प्रीमियम के कारण वैल्यूएशन पर दबाव है।
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक और प्राइवेट इक्विटी ऊंचे घरेलू वैल्यूएशन का लाभ उठा रहे हैं, जबकि घरेलू निवेशक अपेक्षित उच्च रिटर्न नहीं पा रहे।
- U.S. के साथ भारत का $45 अरब व्यापार अधिशेष घटने से चालू खाते और भुगतान संतुलन पर 1-3 साल में दबाव बढ़ने की संभावना है।
पूंजी लागत और वैल्यूएशन का तर्क
Forbes India में प्रकाशित शंकर शर्मा के विश्लेषण के अनुसार, भारतीय बाजार की मुख्य समस्या AI अवसरों की कमी या केवल धीमी आय वृद्धि नहीं, बल्कि पूंजी की ऊंची लागत है। उनका तर्क है कि U.S. ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी के बाद विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से अधिक जोखिम प्रीमियम मांगते हैं, जबकि भारत में वैल्यूएशन ऐसे स्तर पर पहुंच गए हैं जहां कीमतों को आंकड़ों से अधिक भरोसे का सहारा चाहिए।शर्मा के मुताबिक पूंजी की लागत कर्ज की लागत और इक्विटी पर अपेक्षित रिटर्न से बनती है, और भारत में 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर करीब 7 प्रतिशत की जोखिम-मुक्त दर के ऊपर 5 से 6 प्रतिशत जोखिम प्रीमियम जोड़ने पर इक्विटी निवेश के लिए न्यूनतम अपेक्षित रिटर्न काफी ऊंचा हो जाता है। उनका कहना है कि जब महंगाई 2 से 3 प्रतिशत के आसपास हो, तब समग्र कॉरपोरेट मुनाफे के लिए इतने ऊंचे नाममात्र GDP वृद्धि स्तर तक पहुंचना कठिन दिखता है।
उन्होंने Eternal, पहले Zomato, की तुलना DoorDash, Meituan और Deliveroo से करते हुए कहा कि भारतीय कंपनी का वैल्यूएशन मौजूदा लाभप्रदता के अनुपात में बहुत महंगा दिखता है। उनके अनुसार ऐसी कीमतें भारत की खपत कहानी और Blinkit की दीर्घकालिक वृद्धि पर असाधारण आशावाद को दर्शाती हैं, जिससे अमल में चूक की गुंजाइश कम बचती है।
घरेलू पूंजी, बाहरी प्रवाह और व्यापक असर
शर्मा का कहना है कि विदेशी पूंजी को वैश्विक अवसरों में जाने की आजादी है, जबकि घरेलू पूंजी भारत के भीतर सीमित विकल्पों में बंधी है। उनके अनुसार Covid-19 महामारी के बाद अरबों रुपये की घरेलू बचत इक्विटी में आई, क्योंकि रियल एस्टेट महंगा है, सोना रुपये के लिहाज से महंगा हो चुका है और निश्चित आय साधन केवल सीमित प्रतिफल देते हैं।इस परिदृश्य में, उनके मुताबिक, घरेलू निवेशक ऐसे रिटर्न की उम्मीद के साथ बाजार में आए हैं जिन्हें मौजूदा भारतीय शेयर बाजार समग्र रूप से पूरा करने में सक्षम नहीं दिखता। उनका कहना है कि इससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक, वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों को ऊंचे घरेलू वैल्यूएशन का फायदा मिल रहा है।
शर्मा ने यह भी कहा कि बाजार आगामी U.S. व्यापार समझौते और UK तथा यूरोप के साथ संभावित मुक्त व्यापार समझौतों के असर को लेकर सतर्क है। उनके अनुसार बाजार और मुद्रा यह संकेत दे रहे हैं कि भारत का U.S. के साथ 45 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष घट सकता है, जिससे आने वाले एक से तीन वर्षों में चालू खाते और भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ने की आशंका बनती है।
उनका निष्कर्ष है कि भारतीय बाजार में चुनिंदा वृद्धि के अवसर बने रह सकते हैं, लेकिन वे समग्र भारतीय निवेशक संपत्ति पर बड़ा असर डालने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। इसी आधार पर उन्होंने लंबी मंदी की अवधि को ऐसे सुधारात्मक चरण के रूप में पेश किया है जो इक्विटी में अति-उत्साह को कम कर सकता है।
हमारी पहले की रिपोर्ट में मई 2025 में भारत के आठ प्रमुख आधारभूत (कोर) उद्योगों की वृद्धि घटकर 0.5% रहने और इसके पीछे कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद व उर्वरक जैसे पेट्रो-आधारित क्षेत्रों में संकुचन की भूमिका पर चर्चा की गई थी। साथ ही बिजली, सीमेंट और इस्पात में मजबूती के बावजूद ऊर्जा व पेट्रो-लिंक्ड कमजोरियों से औद्योगिक गति पर बने दबाव को रेखांकित किया गया था।
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