भारत में इलेक्ट्रिक वाहन अब पूरक विकल्प से आगे बढ़कर कई खरीदारों के लिए पहली कार बन रहे हैं, क्योंकि कम परिचालन लागत, बेहतर तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा की चिंताएं मांग को बदल रही हैं। यात्री वाहन बाजार में ईवी हिस्सेदारी मई में 6 प्रतिशत के पार पहुंचने से संकेत मिलता है कि यह श्रेणी मुख्यधारा अपनाने के निर्णायक मोड़ के करीब है।
हाइलाइट्स
- मई में भारत में ईवी रिटेल बिक्री 2,71,682 इकाइयों तक पहुंची, कुल वाहन रिटेल में 11 प्रतिशत की हिस्सेदारी और वार्षिक वृद्धि 45 प्रतिशत रही।
- ईवी खंड में टाटा मोटर्स की 38.8 प्रतिशत और महिंद्रा की 23 प्रतिशत बाज़ार हिस्सेदारी दर्ज हुई, जबकि 2030 तक नीति आयोग का 30 प्रतिशत ईवी पैठ का लक्ष्य कायम है।
- 2026 की पहली तिमाही में भारतीय ऑटो और ईवी क्षेत्र में निजी इक्विटी निवेश 702 मिलियन डॉलर पहुंचा, प्रमुख सौदे ईवी से जुड़े रहे।
मांग में बदलाव और अपनाने के प्रमुख कारण
Forbes India के अनुसार, हाल के महीनों में भारतीय उपभोक्ताओं का रुझान ईवी की ओर केवल पर्यावरणीय कारणों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के उपयोग, लागत बचत और बेहतर ड्राइविंग अनुभव के कारण तेज हो रहा है। महिंद्रा और टाटा मोटर्स जैसे वाहन निर्माताओं का कहना है कि उनके अधिकांश ईवी ग्राहक इन वाहनों को घर की प्राथमिक कार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, जो इस श्रेणी के मुख्यधारा में आने का संकेत है।महिंद्रा एंड महिंद्रा के ऑटोमोटिव डिवीजन के मुख्य कार्यपालक नलिनीकांत गोल्लागुंटा का कहना है कि ईवी अब मुख्यधारा का विकल्प बन चुके हैं। कंपनी के अनुसार, उसके लगभग 75 प्रतिशत ग्राहक अपने ईवी को महीने में कम से कम 25 दिन चलाते हैं और करीब 70 प्रतिशत ग्राहक हर महीने 1,000 किमी से अधिक दूरी तय करते हैं। मार्च में महिंद्रा 23 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी के साथ ईवी वॉल्यूम के हिसाब से दूसरे स्थान पर पहुंच गई, जबकि टाटा मोटर्स 38.8 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ी कंपनी बनी हुई है।
उद्योग और सरकार कई वर्षों से ऊंची शुरुआती कीमत, रेंज की चिंता, सीमित चार्जिंग नेटवर्क, बैटरी आयु और पुनर्विक्रय मूल्य जैसी बाधाओं को कम करने में लगे हैं। इसके साथ पश्चिम एशिया संकट से ईंधन आपूर्ति और कीमतों को लेकर अनिश्चितता बढ़ी, जिससे आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों के लिए लागत जोखिम अधिक स्पष्ट हुआ। सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के श्यामासिस दास का कहना है कि ईवी की परिचालन लागत अधिक पूर्वानुमेय है, जबकि पारंपरिक वाहन बाहरी झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बने रहते हैं।
मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईवी उपयोग बढ़ाने की अपील के बाद रिटेल मांग को और बल मिला। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस के अनुसार, उस महीने कुल वाहन रिटेल में ईवी की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत रही और 2,71,682 इकाइयों का पंजीकरण हुआ, जो सालाना आधार पर 45 प्रतिशत अधिक है। डीलरों का कहना है कि 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर ग्राहकों के बीच प्रदर्शन, माइलेज, इंजन आयु और वारंटी पर सवाल भी ईवी के पक्ष में झुकाव बढ़ा रहे हैं।
उपभोक्ता सर्वेक्षण भी इसी रुझान की पुष्टि करते हैं। Deloitte की 2026 Global Automotive Consumer Study में भारतीय उत्तरदाताओं ने अगली गाड़ी के रूप में ईवी चुनने के तीन प्रमुख कारण बेहतर जीवनशैली अनुभव, कम ईंधन लागत और ड्राइविंग अनुभव बताए। खरीदारों के लिए तकनीक, शांत ड्राइव और कम रखरखाव लागत अब बिक्री की केंद्रीय दलील बन चुके हैं।
मूल्य, अवसंरचना और उद्योग पर असर
ईवी अपनाने की रफ्तार बढ़ने के बावजूद भारत का संक्रमण सभी वाहन श्रेणियों में समान नहीं है। नीति आयोग ने 2030 तक कुल ईवी पैठ का 30 प्रतिशत लक्ष्य रखा है, जबकि मई में यह 11 प्रतिशत पर है। Crisil Intelligence का आकलन है कि 2030 तक यात्री वाहनों में ईवी हिस्सेदारी लगभग 15 प्रतिशत और दोपहिया में करीब 20 प्रतिशत के आसपास रह सकती है, जबकि KPMG का अनुमान है कि 2035 तक अधिकांश वाहन श्रेणियों में पैठ 50 प्रतिशत के पार जा सकती है।वाहन निर्माता अब उत्पाद दायरा बढ़ा रहे हैं। इस वर्ष लगभग 30 नए ईवी मॉडल आने वाले हैं और मारुति सुजुकी ने eVitara के साथ इस खंड में प्रवेश किया है। फिर भी उद्योग का मानना है कि असली वृद्धि 12 लाख रुपये से कम कीमत वाले खंड में होगी, जो कुल बाजार का लगभग 65 प्रतिशत है, लेकिन जहां ईवी पैठ अभी केवल 1.5 से 1.6 प्रतिशत है। टाटा मोटर्स का कहना है कि Punch.ev और Tiago जैसे मॉडलों के साथ कीमत का अंतर तुलनीय पेट्रोल, ऑटोमैटिक और CNG विकल्पों के मुकाबले काफी घटा है।
कर ढांचे ने भी ईवी के पक्ष में मूल्य समीकरण सुधारा है। ईवी पर GST 5 प्रतिशत है, जबकि छोटे पारंपरिक वाहनों पर 18 प्रतिशत और बड़े मॉडलों पर 40 प्रतिशत तक कर लगता है। बैटरी तकनीक में सुधार से रेंज भी बढ़ी है, और नई ईवी अब 500 किमी से अधिक दूरी का दावा कर रही हैं, जबकि 2020 में यह लगभग 300 किमी थी। 2025 के अंत तक देश में 29,151 सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन थे, हालांकि इनमें तेज चार्जिंग स्टेशनों की संख्या 8,805 थी, जिससे घर और कार्यस्थल पर चार्जिंग की भूमिका अभी भी निर्णायक बनी हुई है।
बैटरी वारंटी और मरम्मत क्षमता में सुधार से पुनर्विक्रय बाजार को भी सहारा मिल रहा है। Cars24 और Spinny जैसी कंपनियों का कहना है कि वैध बैटरी वारंटी ग्राहकों की सबसे बड़ी चिंता को कम करती है और इस्तेमाल किए गए ईवी की मांग तुलनीय पारंपरिक मॉडलों से बेहतर दिख रही है। वहीं, चार्जिंग, रेट्रोफिट और वाणिज्यिक गतिशीलता जैसे क्षेत्रों में पूंजी प्रवाह बढ़ रहा है। Grant Thornton Bharat के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में भारतीय ऑटो और ईवी क्षेत्र में निजी इक्विटी निवेश 702 मिलियन डॉलर तक पहुंचा, जिसमें ईवी से जुड़े सौदों का दबदबा रहा।
वाणिज्यिक वाहन खंड को भी तेज अवसर के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि सड़क परिवहन ऊर्जा खपत में उसकी हिस्सेदारी बहुत अधिक है। उद्योग के अनुसार, इलेक्ट्रिक बस और तीनपहिया जैसे उपयोग मामलों में परिचालन बचत स्पष्ट है, जबकि वित्तपोषण और तेज चार्जिंग समाधान इस बदलाव को व्यावहारिक बना रहे हैं। इसके साथ ही, भारत की ईवी रणनीति एक नई आपूर्ति श्रृंखला चुनौती भी खड़ी कर रही है, क्योंकि लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ मृदा तत्वों जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए आयात, खासकर चीन पर निर्भरता, एक दीर्घकालिक जोखिम बना हुआ है।
भारत में मध्यम वर्ग के विस्तार और खपत में उसकी बढ़ती भूमिका पर हमारी पिछली रिपोर्ट में बताया गया था कि यह वर्ग अब बड़े महानगरों से आगे टियर II और टियर III शहरों तक फैल रहा है और देश की खपत-आधारित वृद्धि का प्रमुख आधार बन रहा है। इसमें वित्तीय समावेशन, डिजिटल भुगतान और कर राहत जैसे कदमों से खपत को मिले समर्थन, साथ ही STEM शिक्षा और कौशल पहलों के जरिए एआई अपनाने की तेज होती प्रवृत्ति को भी रेखांकित किया गया था।
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