ANRF का RDI Fund जल्द फंड मैनेजरों का पहला समूह घोषित करने की तैयारी में
भारत में निजी पूंजी और डीप-टेक स्टार्टअप्स अनुसंधान, विकास और नवाचार को बढ़ाने के लिए RDI Fund के संभावित गुणक प्रभाव पर दांव लगा रहे हैं। नवंबर 2025 में Anusandhan National Research Foundation के तहत शुरू किया गया 1 लाख करोड़ रुपये का यह कोष रणनीतिक क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के R&D निवेश को तेज करने के लिए रियायती दीर्घकालिक ऋण उपलब्ध कराता है।
हाइलाइट्स
- RDI Fund जल्द ही सेकेंडरी फंड मैनेजरों के पहले समूह की घोषणा करेगा, जिसके बाद साल में एक से अधिक बार नए समूह चुने जाएंगे।
- TDB और BIRAC को RDI Fund के तहत 2,000-2,000 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए हैं, जिसमें फोकस लेट-स्टेज पूंजी व debt या convertible debentures पर है।
- RDI Fund का उद्देश्य 1 लाख करोड़ रुपये के सार्वजनिक निवेश से 4 लाख करोड़ रुपये की निजी पूंजी आकर्षित कर 10 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक प्रभाव उत्पन्न करना है।
फंड मैनेजर चयन और तैनाती की रूपरेखा
Forbes India को दिए एक विशेष साक्षात्कार में ANRF के CEO डॉ शिवकुमार कल्याणरमन ने कहा कि RDI Fund जल्द ही सेकेंडरी फंड मैनेजरों के पहले समूह की घोषणा करने के करीब है, जिसके बाद अगले समूहों के लिए भी आह्वान जारी होगा। उन्होंने कहा कि ये समूह साल में एक से अधिक बार भी चुने जा सकते हैं, जबकि कोष उभरते पोर्टफोलियो, रणनीतिक कमी वाले क्षेत्रों और सप्लाई चेन विकसित करने की जरूरतों का आकलन करता रहेगा।कल्याणरमन के अनुसार, फंड मैनेजरों के चयन में निवेश का सिद्ध अनुभव, प्रौद्योगिकी का आकलन करने की क्षमता, इकोसिस्टम निर्माण, बाजार पहुंच और साझेदारी ढांचे जैसे पहलुओं पर जोर रहेगा। उन्होंने कहा कि मैनेजरों का स्वयं तकनीकी विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं है, लेकिन उन्हें उपयुक्त विशेषज्ञ सहायता के साथ ऐसी परियोजनाओं में निवेश करने में सक्षम होना चाहिए जो इस एसेट क्लास को बढ़ा सकें।
उन्होंने यह भी कहा कि RDI Fund शुरुआती चरण से लेकर अंतिम चरण तक पूरे डीप-टेक निवेश स्पेक्ट्रम को एक एसेट क्लास के रूप में देखता है। उनके मुताबिक, TDB और BIRAC को RDI Fund के तहत 2,000-2,000 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है और उनका फोकस लेट-स्टेज पूंजी उपलब्ध कराने पर है, जिसमें कम dilution वाली, धैर्यपूर्ण पूंजी को debt या convertible debentures के रूप में संरचित किया जाता है।
निजी R&D निवेश और भारत की तकनीकी स्वायत्तता पर असर
कल्याणरमन ने कहा कि भारत में R&D निवेश को सरकार-नेतृत्व वाले मॉडल से सरकार-प्रेरित और फिर निजी क्षेत्र-नेतृत्व वाले मॉडल की ओर बढ़ना होगा। उनके अनुसार, कुल R&D निवेश GDP के लगभग 0.64 प्रतिशत से बढ़कर 0.84 प्रतिशत तक पहुंचा है, लेकिन विकसित पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात 2 से 3 प्रतिशत के बीच है और वहां गैर-सरकारी हिस्सेदारी भी कहीं अधिक है।उन्होंने कहा कि लक्ष्य अगले दो दशकों में भारत के R&D निवेश को GDP के 3 प्रतिशत तक ले जाना है, और RDI Fund का मकसद करदाताओं के 1 लाख करोड़ रुपये के निवेश से अतिरिक्त 4 लाख करोड़ रुपये की निजी पूंजी को आकर्षित करना है। उनके मुताबिक, यह पूंजी अर्थव्यवस्था में पहुंचकर लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के प्रभाव के करीब जा सकती है, जिससे कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों और पूंजी प्रदाताओं के बीच बड़ा उत्प्रेरक प्रभाव बन सकता है।
ANRF की व्यापक भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि संस्था सरकार, उद्योग, अकादमिक जगत और उद्यमिता के बीच समन्वय बनाकर भारत को अनुसंधान और नवाचार महाशक्ति के रूप में उभारने पर केंद्रित है। उनके अनुसार, यह ढांचा भारत को महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता, दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता और रणनीतिक क्षेत्रों में संप्रभु तकनीकी क्षमता मजबूत करने में मदद करता है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में भारत में आईपी-आधारित डीप-टेक विनिर्माण कंपनियों में बढ़ती निजी निवेशक दिलचस्पी और पूंजी प्रवाह की दिशा पर चर्चा की गई थी। उसमें बताया गया था कि अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर, रक्षा, ऊर्जा और उन्नत मशीनरी जैसे क्षेत्रों में नीतिगत प्रोत्साहन—जैसे 1 लाख करोड़ रुपये का R&D/इनोवेशन फंड और PLI जैसी योजनाएं—दीर्घकालिक, धैर्यपूर्ण पूंजी को आकर्षित कर रही हैं, हालांकि इन व्यवसायों के परिपक्व होने और निकास चक्र बनने में समय लग सकता है।
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