भारत का बाह्य ऋण मार्च 2026 के अंत तक बढ़कर U.S.$620 अरब, RBI ने स्थिरता को सहज बताया

भारत का बाह्य ऋण मार्च 2026 के अंत तक बढ़कर U.S.$620 अरब, RBI ने स्थिरता को सहज बताया
भारत का बढ़ता बाह्य ऋण

भारत का बाह्य ऋण मार्च 2026 के अंत तक बढ़कर U.S.$620.0 अरब आंका जाता है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 5.5% अधिक है। कुल बाह्य ऋण में वाणिज्यिक ऋण की हिस्सेदारी लगभग 50.3% है, जबकि ऋण सेवा अनुपात 5.1% पर सहज बना हुआ है।

हाइलाइट्स

  • मार्च 2026 के अंत तक भारत का बाह्य ऋण बढ़कर U.S.$620 अरब पहुंचने का अनुमान है, जिसमें अल्पकालिक ऋण का हिस्सा 25.1% रहेगा।
  • RBI के अनुसार, बाह्य ऋण बढ़ोतरी मुख्य रूप से निजी क्षेत्र द्वारा external commercial borrowing में वृद्ध‍ि के कारण है, पर स्तर प्रबंधनीय है।
  • RBI की रिपोर्ट के मुताबिक पुनर्भुगतान क्षमता व समग्र प्रोफाइल नियंत्रित है, बाह्य ऋण संरचना कुल मिलाकर वित्तीय स्थिरता के लिए संतुलित है।

मार्च 2026 के ऋण ढांचे की मुख्य तस्वीर

Reserve Bank of India की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, कुल बाह्य ऋण में अल्पकालिक ऋण की हिस्सेदारी मार्च 2025 के अंत में 24.7% से बढ़कर मार्च 2026 के अंत में 25.1% हो जाती है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से निजी क्षेत्र की बढ़ती external commercial borrowing से जुड़ी है और फिलहाल यह स्तर प्रबंधनीय बना हुआ है।

RBI ने कहा है कि भारत का बाह्य ऋण अत्यधिक टिकाऊ है और इसके स्थायित्व को लेकर तत्काल कोई चिंता नहीं है। विस्तृत आकलन में यह भी रेखांकित किया गया है कि ऋण संरचना समग्र रूप से स्वस्थ बनी हुई है।

वित्तीय स्थिरता और बाजार पर असर

बाह्य ऋण के संयोजन में वाणिज्यिक ऋण की बड़ी हिस्सेदारी यह दिखाती है कि विदेशी उधारी में कॉरपोरेट और निजी क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। अल्पकालिक ऋण का हिस्सा थोड़ा बढ़ने के बावजूद, RBI का आकलन यह संकेत देता है कि पुनर्भुगतान क्षमता और समग्र देनदारी प्रोफाइल अभी भी नियंत्रित दायरे में है।

रिपोर्ट में क्षेत्रवार संरचना, ऋण की मुद्रा संरचना और पुनर्भुगतान अनुसूची जैसे पहलुओं का भी उल्लेख है। इन संकेतकों से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत की बाह्य ऋण संरचना फिलहाल संतुलित है और व्यापक वित्तीय स्थिरता के लिए सहायक बनी हुई है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में RBI के विदेशी मुद्रा जोखिम नियमों में बदलाव और इसके EUR/INR जोड़ी पर पड़े असर पर चर्चा की गई थी। इसमें बताया गया था कि ऑनशोर-ऑफशोर पोजिशन को मिलाने और नेट ओपन पोजिशन गणना में ढील से बैंकों की मुद्रा-जोखिम रणनीतियों व बाजार तरलता की अपेक्षाएं बदल सकती हैं, जबकि EUR/INR तकनीकी रूप से सीमित दायरे में स्थिर रहने के संकेत दे रहा था।

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