भारत की हिंद महासागर रणनीति में निवेश, कनेक्टिविटी पर जोर, जयशंकर ने क्षेत्रीय साझेदारी का रोडमैप बताया
दिल्ली में रायसीना डायलॉग के मंच से विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत की वैश्विक भूमिका को घरेलू आर्थिक मजबूती और व्यावहारिक क्षेत्रीय भागीदारी से जोड़ते हुए हिंद महासागर क्षेत्र में संसाधन आधारित सहयोग बढ़ाने की रूपरेखा रखी। वित्तीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि भारत का उभार प्रतिद्वंद्वियों की गलतियों पर नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक लचीलापन, कूटनीतिक पहुंच और साझेदारी गढ़ने की क्षमता पर निर्भर होगा। साथ ही, श्रीलंका के दक्षिण अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी नौसैनिक पोत के डूबने की घटना के बाद समुद्री सुरक्षा और मानवीय प्रतिक्रिया के सवाल भी चर्चा में रहे।
हाइलाइट्स
- विदेश मंत्री जयशंकर ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और आर्थिक नेटवर्क में निवेश को पिछले दशक में ज़रूरी और बढ़ता बताया।
- ईरानी पोत IRIS Dena के डूबने के बाद भारत ने 1 मार्च को संकट ग्रस्त पोत को कोच्चि डॉकिंग की अनुमति दी और 183 नाविकों की मानवीय सहायता में भाग लिया।
- जयशंकर ने कहा कि व्यापारिक जहाजों पर जोखिम भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा और सप्लाई चेन-बीमा लागत के लिए महत्वपूर्ण चिंता है, जिसमें 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय खाड़ी में रहते हैं।
हिंद महासागर में भारत का निवेश आधारित दृष्टिकोण
Financial Express के अनुसार, जयशंकर ने कहा कि “हिंद महासागर पहचान” को सिर्फ भावना के स्तर पर नहीं, बल्कि इन्फ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और आर्थिक सहयोग जैसी ठोस प्रतिबद्धताओं से मजबूती देनी होगी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हिंद महासागर का नाम एक देश के नाम पर है और भारत भौगोलिक रूप से इसके केंद्र में स्थित है, इसलिए क्षेत्रीय साझेदारी में भारत की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। मंत्री के अनुसार भारत की आर्थिक वृद्धि का लाभ हिंद महासागर क्षेत्र के कई देशों को मिल सकता है, खासकर उन देशों को जो भारत के साथ व्यावहारिक परियोजनाओं पर काम करेंगे।
उन्होंने क्षेत्र को एक आपस में जुड़ा इकोसिस्टम बताया जो आर्थिक व्यवधानों, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार पैटर्न में बदलाव के बाद धीरे-धीरे रिकवरी और रीबिल्डिंग के चरण में है। उनके मुताबिक व्यापार मार्गों, कनेक्टिविटी और आर्थिक नेटवर्क की बहाली के लिए निरंतर प्रयास जरूरी हैं और पिछले एक दशक में भारतीय कूटनीति ने इसमें निवेश बढ़ाया है। उन्होंने संकेत दिया कि यह एजेंडा केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों और क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़ा है।
समुद्री सुरक्षा, ईरानी पोत घटना और मानवीय प्रतिक्रिया
मंत्री की टिप्पणियां उस पृष्ठभूमि में आईं जब श्रीलंका के दक्षिण अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी नौसैनिक पोत IRIS Dena के डूबने पर ध्यान बढ़ा है, रिपोर्ट के अनुसार यह पोत भारतीय नौसेना की मेजबानी में हुए अंतरराष्ट्रीय समुद्री अभ्यास से लौटते समय अमेरिका की कार्रवाई के बाद डूबा। जयशंकर ने घटना को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और इसकी तुलना ईरानी पोत IRIS Lavan के मामले से की, जिसे तकनीकी समस्या के बाद आपात डॉकिंग के लिए कोच्चि आने की अनुमति दी गई थी। उनके अनुसार ईरान ने Dena घटना से कुछ दिन पहले भारत से सहायता मांगी थी, नई दिल्ली ने 1 मार्च को डॉकिंग मंजूर की और पोत 183 नाविकों के साथ कोच्चि पहुंचा, जिनमें कई युवा कैडेट थे।जयशंकर ने कहा कि जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद भारत का फैसला मानवीय आधार पर लिया गया क्योंकि संकट में फंसे जहाज को मदद देना “मानवीय काम” था। Dena के मामले में भी, उन्होंने बताया कि कोलंबो के मैरीटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सेंटर से संकट संकेत मिलने के बाद भारत ने खोज और बचाव प्रयासों में भाग लिया। भारतीय नौसेना ने श्रीलंकाई प्रयासों में सहायता के लिए लंबी दूरी का समुद्री गश्ती विमान तैनात किया।
व्यापारिक जहाजों पर जोखिम और भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा
जयशंकर ने संघर्ष-प्रभावित जलक्षेत्रों में चलने वाले व्यापारी जहाजों की सुरक्षा को एक प्रमुख चिंता बताया, खासकर इसलिए क्योंकि वैश्विक मर्चेंट मरीन वर्कफोर्स में भारतीय नाविकों की हिस्सेदारी बड़ी है। उन्होंने कहा कि मालवाहक जहाजों पर हमले की स्थिति में अक्सर जहाज का कोई हिस्सा भारतीय कर्मियों द्वारा संचालित होने की संभावना रहती है। इस संदर्भ में समुद्री मार्गों की सुरक्षा का आर्थिक महत्व भी बढ़ जाता है, क्योंकि किसी भी व्यवधान का असर आपूर्ति श्रृंखला, बीमा लागत और माल ढुलाई समय पर पड़ सकता है।मंत्री के अनुसार क्षेत्र में भारत की नीतियां केवल भू-राजनीतिक गणनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग में काम करने वाले हजारों भारतीयों के हित भी जुड़े हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि हिंद महासागर क्षेत्र में लंबे समय से रणनीतिक प्रतिष्ठान और विदेशी सैन्य ठिकाने मौजूद रहे हैं, इसलिए जोखिम प्रबंधन और सहयोग-आधारित सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बनी रहती है। व्यापक तौर पर, यह दृष्टिकोण भारत की आर्थिक वृद्धि, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और क्षेत्रीय स्थिरता को एक साथ जोड़ने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया गया।
हमने पहले अमेरिकी अस्थायी छूट के तहत भारतीय रिफाइनरों के लिए समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल कार्गो की खरीद और डिलीवरी के रास्ते पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में समयसीमा, भारत की ‘आपूर्ति सुरक्षा’ को लेकर दलील, और अरब सागर व हिंद महासागर में निष्क्रिय पड़े कार्गो से जुड़ी कीमतों व व्यापारिक जोखिमों पर चर्चा की गई थी।
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