रक्षा मंत्रालय के अनुसार, शुक्रवार को 858 करोड़ रुपये के दो अनुबंधों पर हस्ताक्षर होते हैं, जिनमें भारतीय सेना के लिए 445 करोड़ रुपये की तुंगुस्का एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली और भारतीय नौसेना के पी8आई बेड़े के डिपो स्तर निरीक्षण का प्रबंध शामिल है. मंत्रालय कहता है कि यह कदम भारत-रूस रक्षा सहयोग को मजबूत करता है और साथ ही स्वदेशी रखरखाव क्षमता बढ़ाने की नीति के अनुरूप है. हस्ताक्षर कर्तव्य भवन-2 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में होते हैं.
हाइलाइट्स
- 445 करोड़ रुपये का तुंगुस्का एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली सौदा जेएससी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट से भारतीय सेना की बहुस्तरीय वायु सुरक्षा क्षमता के लिए हुआ।
- 413 करोड़ रुपये का पी8आई विमान रखरखाव अनुबंध बोइंग इंडिया के साथ हुआ, जिसमें 100 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री और बाय इंडियन श्रेणी का पालन किया गया।
- इन समझौतों से विदेशी क्षमताओं की आपूर्ति और घरेलू रखरखाव तथा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र दोनों को सशक्त करने का संकेत मिलता है।
तुंगुस्का और पी8आई अनुबंधों की संरचना
मंत्रालय बताता है कि तुंगुस्का एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली की खरीद जेएससी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट से की जाती है. 445 करोड़ रुपये का यह सौदा भारतीय सेना की बहुस्तरीय वायु रक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए है. मंत्रालय के मुताबिक, यह प्रणाली विमान, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे हवाई खतरों के खिलाफ प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाती है.
दूसरा अनुबंध भारतीय नौसेना के पी8आई लंबी दूरी समुद्री टोही विमान के निरीक्षण, डिपो स्तर रखरखाव और देश के भीतर बेड़े की देखभाल से जुड़ा है. यह 413 करोड़ रुपये का सौदा बोइंग इंडिया डिफेंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ होता है. सरकार इसे बाय इंडियन श्रेणी और 100 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री के ढांचे से जोड़ती है.
दोनों अनुबंध मिलकर परिचालन उपलब्धता, रखरखाव व्यवस्था और दीर्घकालिक सेवा समर्थन पर जोर देते हैं. रक्षा खरीद में यह संयोजन एक ओर तत्काल क्षमता सुदृढ़ीकरण दिखाता है, तो दूसरी ओर प्लेटफॉर्म समर्थन को घरेलू स्तर पर स्थापित करने की दिशा भी बताता है. इससे सैन्य परिसंपत्तियों की सेवा-योग्यता पर सीधा प्रभाव पड़ता है.
रक्षा उद्योग और रणनीतिक साझेदारी पर असर
रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह समझौता भारत और रूस के बीच रणनीतिक रक्षा साझेदारी को और मजबूत करता है. तुंगुस्का प्रणाली का अनुबंध वायु रक्षा क्षेत्र में विदेशी आपूर्ति पर आधारित है, जबकि पी8आई रखरखाव अनुबंध घरेलू औद्योगिक भागीदारी को बढ़ावा देता है. इस तरह सौदों का ढांचा आयातित क्षमता और स्थानीय समर्थन तंत्र, दोनों को साथ लेकर चलता है.
पी8आई अनुबंध को सरकार मेक-इन-इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहलों के अनुरूप रखती है. देश के भीतर रखरखाव होने से नौसेना के लिए लॉजिस्टिक समय और संचालन संबंधी निर्भरता कम होने की संभावना बनती है. इससे रक्षा एयरोस्पेस सेवा शृंखला और तकनीकी समर्थन पारिस्थितिकी तंत्र को भी काम मिलता है.
वृहद स्तर पर यह कदम ऐसे समय आता है जब भारत रक्षा आधुनिकीकरण, रखरखाव स्वदेशीकरण और बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचे पर समानांतर फोकस रखता है. वायु रक्षा और समुद्री निगरानी, दोनों क्षेत्रों में निवेश से सैन्य तैयारी के अलग-अलग आयाम मजबूत होते हैं. इससे रक्षा क्षेत्र में अनुबंध-आधारित औद्योगिक गतिविधि और नीति प्राथमिकताओं की दिशा भी स्पष्ट होती है.
हमारी पिछली रिपोर्ट में GE एयरोस्पेस के शेयर पर बने दबाव और इसके तकनीकी संकेतकों पर चर्चा की गई थी, जबकि कंपनी भारत और मध्य पूर्व जैसे उभरते बाजारों में मजबूत अंतरराष्ट्रीय वृद्धि दिखा रही थी। उस लेख में निकट अवधि के लिए $282–$293 की रेंज, $282 के सपोर्ट और $292–$295 के ऊपर निर्णायक ब्रेकआउट की जरूरत को प्रमुख स्तरों के रूप में रेखांकित किया गया था।
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