भारत ईंधन कीमतों को थामने के लिए कर राजस्व में कटौती करता है

भारत ईंधन कीमतों को थामने के लिए कर राजस्व में कटौती करता है
भारत घटाएगा कर-राजस्व

केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के विस्तृत बयान के अनुसार, भारत सरकार वैश्विक कच्चे तेल की तेज उछाल के बीच पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क से आंशिक रूप से अलग रखती है। लेख में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खाड़ी क्षेत्र की प्रमुख तेल अवसंरचना पर हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध के लंबे असर से आपूर्ति दबाव बढ़ता है, जबकि ब्रेंट कच्चा तेल तीन अंकों के स्तर पर बना रहता है।

हाइलाइट्स

  • सरकार ने पेट्रोल पर लगभग 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 30 रुपये प्रति लीटर कर राजस्व त्याग कर उपभोक्ता कीमतें कंट्रोल कीं, जिससे सरकारी घाटा बढ़ा।
  • भारत रूसी एलएनजी आपूर्ति फिर से शुरू करने की बातचीत कर रहा है, जिससे रूसी तेल देश के कुल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हो सकता है।
  • निर्यात कर और कर बोझ पुनर्वितरण से अल्पकालिक उपभोक्ता राहत मिलती है, लेकिन यह रिफाइनिंग मार्जिन, ऊर्जा क्षेत्र लाभप्रदता और सरकारी वित्तीय दबाव बढ़ाता है।

सरकारी राहत रणनीति और राजकोषीय दबाव

पुरी कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर एक महीने में 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है। उनके अनुसार, ऐसे माहौल में सरकार के सामने दो विकल्प थे, या तो उपभोक्ताओं पर तेज मूल्य वृद्धि डाली जाती, या फिर सरकारी वित्त और संस्थान इसका बोझ उठाते। सरकार दूसरी राह चुनती है और तेल विपणन कंपनियों की अंडर-रिकवरी कम करने के लिए कर राजस्व में उल्लेखनीय त्याग करती है.

मंत्री के अनुसार, पेट्रोल पर लगभग 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 30 रुपये प्रति लीटर का बोझ सरकार वहन करती है ताकि उपभोक्ता कीमतें अपेक्षाकृत नरम रहें। लेख के मुताबिक, यह कदम सरकारी कर संग्रह पर बड़ा असर डालता है। इसके साथ ही घरेलू रिफाइनरियों पर निर्यात कर लगाया जाता है ताकि भारत में परिष्कृत ईंधन का लाभ पहले घरेलू बाजार को मिले.

पुरी यह भी रेखांकित करते हैं कि दक्षिण पूर्व एशिया, उत्तर अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के कई हिस्सों में पंप कीमतों में 20 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी जाती है। इस तुलना के जरिए सरकार अपनी मूल्य नियंत्रण नीति को उपभोक्ता संरक्षण के उपाय के रूप में पेश करती है।

वैश्विक आपूर्ति संकट और भारत की आयात नीति

लेख के अनुसार, ईरान और इजरायल-यू.एस. गठजोड़ के बीच जारी युद्ध से वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रहती है। खाड़ी क्षेत्र में आपूर्ति व्यवधान और रूस-यूक्रेन युद्ध का लंबा खिंचाव तेल बाजार की नाजुक स्थिति को और कठिन बनाता है। इसी पृष्ठभूमि में भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आयात स्रोतों का पुनर्संतुलन करता है.

रॉयटर्स के हवाले से लेख में कहा गया है कि भारत रूसी एलएनजी आपूर्ति फिर से शुरू करने पर बातचीत करता है ताकि बिजली और औद्योगिक क्षेत्रों को स्थिरता मिल सके। रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी तेल जल्द ही भारत के कुल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बन सकता है। यह रुख पहले की उस स्थिति से अलग है जब नई दिल्ली ने यू.एस. शुल्क और प्रतिबंधों के दबाव में रूसी खरीद घटाई थी.

मौजूदा मूल्य वातावरण में सस्ते और उपलब्ध कच्चे तेल की जरूरत भारत की खरीद रणनीति को अधिक व्यावहारिक बनाती है। इससे घरेलू ईंधन मूल्य प्रबंधन, ऊर्जा आपूर्ति और औद्योगिक लागत नियंत्रण, तीनों पर असर पड़ता है।

भारत के ऊर्जा बाजार पर संभावित असर

यह नीति अल्पावधि में उपभोक्ताओं को राहत देती है, लेकिन राजकोषीय दबाव बढ़ाती है और सार्वजनिक वित्त के लिए संतुलन कठिन बनाती है। तेल विपणन कंपनियों, रिफाइनरियों और कर प्रशासन के बीच बोझ का पुनर्वितरण ऊर्जा क्षेत्र की लाभप्रदता और निवेश संकेतकों को प्रभावित कर सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो इस मॉडल को लंबे समय तक बनाए रखना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

दूसरी ओर, रूसी आपूर्ति की वापसी भारत को स्रोत विविधीकरण और लागत प्रबंधन में सहारा दे सकती है। घरेलू बाजार को प्राथमिकता देने वाली निर्यात कर नीति स्थानीय उपलब्धता बढ़ाने का प्रयास करती है, पर इससे रिफाइनिंग निर्यात मार्जिन पर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, सरकार की मौजूदा रणनीति उपभोक्ता संरक्षण, ऊर्जा सुरक्षा और राजस्व हानि के बीच संतुलन साधने की कोशिश करती है.

ऊर्जा क्षेत्र के लिए इसका व्यापक अर्थ यह है कि भारत वैश्विक भू-राजनीतिक झटकों के दौर में अधिक सक्रिय मूल्य प्रबंधन मॉडल अपनाता है। यह रुख निकट अवधि में मुद्रास्फीति पर नियंत्रण में मदद कर सकता है, जबकि दीर्घावधि में आयात निर्भरता और कर संरचना पर नई बहस को जन्म देता है।

हमने पहले पश्चिम एशिया संकट पर संसद परिसर में हुई सर्वदलीय बैठक और सरकार के ऊर्जा-आपूर्ति आश्वासन पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में 41 देशों से सोर्सिंग के जरिए आयात विविधीकरण, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास शिपिंग/सप्लाई-चेन जोखिम, तथा तनाव लंबा खिंचने पर आयात लागत और आपूर्ति प्रबंधन की चुनौतियों को रेखांकित किया गया था।

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