भारत सरकार ने पश्चिम एशिया संकट पर ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री शिपमेंट जारी रखने का भरोसा दिया
सरकार ने बुधवार को संसद परिसर में हुई सर्वदलीय बैठक में कहा कि पश्चिम एशिया का युद्ध जल्द समाप्त होना चाहिए और भारत की प्राथमिकता खाड़ी क्षेत्र में भारतीयों की सुरक्षा तथा घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है। बैठक में सरकार के अनुसार देश के पास पर्याप्त भंडार है, कच्चे तेल और गैस की अतिरिक्त आपूर्ति रास्ते में है, तथा 41 देशों से सोर्सिंग के जरिए आयात स्रोतों का विविधीकरण किया गया है। इसी दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि भारत कोई “दलाल राष्ट्र” नहीं है।
हाइलाइट्स
- सरकार ने आश्वस्त किया कि ऊर्जा आपूर्ति स्थिर है, 41 देशों से तेल-गैस खरीदी जा रही है और पर्याप्त स्टॉक व खेप उपलब्ध हैं।
- होर्मुज जलडमरूमध्य पार करने वाले चार जहाज सुरक्षित पहुंचे, जबकि 18 भारत-गामी जहाज अब भी इलाके में फंसे हैं जिससे आपूर्ति जोखिम कायम है।
- विपक्ष ने संसद में बहस की मांग की, सरकार ने जवाब दिया कि यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा चला तो आयात लागत और आपूर्ति प्रबंधन प्रमुख नीति चुनौती रहेंगे।
सर्वदलीय बैठक में सरकार का पक्ष और ऊर्जा आश्वासन
बैठक में सरकार ने विपक्ष के उस आरोप को खारिज किया कि नई दिल्ली पश्चिम एशिया की स्थिति पर चुप है, और कहा कि वह लगातार प्रतिक्रिया दे रही है। सरकार ने यह भी कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव को देखते हुए अग्रिम ऑर्डर किए जा चुके हैं। अधिकारियों ने प्रतिभागियों को बताया कि घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और तेल तथा गैस की और खेप आ रही है।
सरकार के मुताबिक, तेल और गैस आपूर्ति के स्रोतों में विविधीकरण किया गया है और अब 41 देशों से खरीद की जा रही है। बैठक में यह भी बताया गया कि पेट्रोलियम उत्पाद लेकर भारत आने वाले चार जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर चुके हैं, जबकि पांच और जल्द पार करने की उम्मीद है। साथ ही 18 भारत-गामी जहाज जलडमरूमध्य के आसपास फंसे हुए हैं, जिससे समुद्री आपूर्ति शृंखला पर जोखिम का संकेत मिलता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रारंभिक टिप्पणी की, जबकि जयशंकर और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी बैठक में अपनी बात रखी। प्रश्नोत्तर सत्र में अधिकतर जवाब जयशंकर ने दिए और कुछ मौकों पर गृह मंत्री अमित शाह ने भी हस्तक्षेप किया। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने उपस्थित दलों के सामने प्रस्तुति भी दी।
कूटनीतिक संतुलन, शिपिंग जोखिम और विपक्ष की मांग
सरकार ने बैठक में कहा कि भारत सभी पक्षों के साथ संबंध बनाए हुए है, क्योंकि U.S. उसका सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, इजराइल सबसे बड़ा प्रौद्योगिकी भागीदार है और ईरान के साथ भी अच्छे संबंध हैं। इसी संदर्भ में सरकार ने समुद्री सुरक्षा और जहाजरानी को लेकर अपने कदमों का उल्लेख किया। उसने यह भी कहा कि भारत की चिंता केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा आयात मार्गों की निरंतरता और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा से भी जुड़ी है।
U.S. हमले और एक ईरानी जहाज के डूबने पर सरकार ने कहा कि यदि घटना भारतीय जलक्षेत्र में होती तो जहाज को बचाया जाता, लेकिन वह श्रीलंकाई जलक्षेत्र के पास था। सरकार ने यह भी कहा कि अन्य जहाजों और नाविकों की सुरक्षा में भारत की भूमिका के कारण ईरान की ओर आभार की भावना है। यह रुख बताता है कि नई दिल्ली संघर्ष के बीच मानवीय और समुद्री सुरक्षा आयामों को भी रेखांकित कर रही है।
विपक्ष ने हालांकि बैठक में दिए गए जवाबों को असंतोषजनक बताया और लोकसभा तथा राज्यसभा में इस मुद्दे पर बहस की मांग दोहराई। कांग्रेस के तारिक अनवर ने कहा कि पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है जबकि भारत मूक दर्शक बना हुआ है। माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने भी कहा कि विपक्षी दलों ने एक संप्रभु देश ईरान पर U.S. के एकतरफा हमले पर सरकार की चुप्पी पर असहमति जताई।
घरेलू राजनीतिक संदेश और भारत पर संभावित असर
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बैठक के बाद कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा पर यह बैठक बुलाई गई और सरकार ने पश्चिम एशिया संघर्ष से भारत पर पड़ने वाले असर तथा उठाए गए कदमों पर विस्तृत जानकारी दी। उनके अनुसार, सरकार ने विपक्ष के सभी सवालों का उत्तर दिया और अंत में विपक्षी दलों ने संकट की घड़ी में सरकार के आवश्यक निर्णयों का समर्थन करने की बात कही। यह संदेश घरेलू राजनीतिक एकजुटता दिखाने का प्रयास भी है, खासकर तब जब बाहरी संघर्ष ऊर्जा और व्यापार दोनों पर असर डाल सकता है।
इसके विपरीत, विपक्षी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है और संसद में औपचारिक चर्चा जरूरी है। इस बहस का सीधा संबंध भारत की ऊर्जा लागत, समुद्री माल ढुलाई, बीमा जोखिम और खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा से है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है, तो आयात लागत और आपूर्ति प्रबंधन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख नीति मुद्दे बने रहते हैं।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की अनुपस्थिति को गैरजिम्मेदाराना बताया और इस पर राजनीतिक सवाल उठाए। इस तरह, पश्चिम एशिया संकट पर विदेश नीति की चर्चा अब घरेलू राजनीतिक टकराव के साथ भी जुड़ रही है। इससे संकेत मिलता है कि बाहरी भू-राजनीतिक तनाव का प्रभाव संसद की रणनीति और जनमत दोनों पर पड़ रहा है।
हमने पहले पश्चिम एशिया संकट पर प्रस्तावित सर्वदलीय बैठक के एजेंडे और सरकार की संकट-प्रबंधन तैयारी पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में ऊर्जा सुरक्षा, एलपीजी व उर्वरक आपूर्ति, व्यापार मार्गों (खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य) पर संभावित असर, तथा लंबे खिंचने वाले तनाव की स्थिति में आर्थिक/लॉजिस्टिक्स तैयारियों और राजनीतिक प्रतिक्रिया के संकेतों को रेखांकित किया गया था।
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