लोकसभा विस्तार और महिला आरक्षण क्रियान्वयन के लिए 131वां संशोधन विधेयक पेश होने वाला है

लोकसभा विस्तार और महिला आरक्षण क्रियान्वयन के लिए 131वां संशोधन विधेयक पेश होने वाला है
लोकसभा में आरक्षण विस्तार

पीटीआई के अनुसार, सरकार बृहस्पतिवार को संसद में संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करने जा रही है, जिसका मकसद 2023 के महिला आरक्षण कानून को जल्दी लागू करना है। मसौदे में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 543 से बढ़ाकर 850 तक करने का प्रस्ताव है, ताकि नई जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया के आधार पर महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण को लागू किया जा सके। इसी पैकेज के तहत परिसीमन कानून और दिल्ली, जम्मू-कश्मीर तथा पुडुचेरी जैसे विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सक्षम विधेयक लाने की भी योजना है।

हाइलाइट्स

  • संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन के तहत लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 तक बढ़ाने और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटों का प्रस्ताव है।
  • महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रवर्तन को गति देने के लिए परिसीमन और सीट पुनर्संरचना का रास्ता अपनाया गया, जिससे महिला प्रतिनिधित्व संस्थागत रूप से बढ़ सकता है।
  • सीटों के पुनर्विन्यास व लोकसभा विस्तार से उम्मीदवार चयन, दलगत रणनीति और क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व पर बड़ा असर पड़ने की संभावना है।

विधेयक का ढांचा और संसदीय योजना

प्रस्तावित विधेयक संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का प्रावधान करता है। मसौदे के अनुसार, लोकसभा में राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने गए सदस्यों की संख्या 815 से अधिक नहीं होगी, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधित्व के लिए 35 तक सदस्य रखने का प्रावधान होगा। इस तरह सदन की कुल अधिकतम संख्या 850 तक पहुंच सकती है।

विधेयक में “जनसंख्या” की परिभाषा उस जनगणना से जुड़ी है, जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हों। अभी 2011 की जनगणना के आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन सरकार का तर्क है कि अगली जनगणना और उसके बाद की परिसीमन प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। इसी देरी को देखते हुए महिलाओं की प्रभावी और समर्पित भागीदारी को तेज करने के लिए यह विधायी ढांचा तैयार किया गया है।

सरकार बृहस्पतिवार को लोकसभा में एक साथ कई विधायी प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। इनमें संविधान संशोधन विधेयक, परिसीमन कानून से जुड़ा विधेयक और विधानमंडल वाले कुछ केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सक्षम कानून शामिल हैं। यह पैकेज महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 के क्रियान्वयन को तेज करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

महिला आरक्षण और परिसीमन पर संभावित असर

मसौदे के उद्देश्य और कारणों के बयान में कहा गया है कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं, तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण को लागू करना प्रमुख लक्ष्य है। यह व्यवस्था परिसीमन अभ्यास के माध्यम से लागू की जानी है, जो नवीनतम प्रकाशित जनगणना आंकड़ों के आधार पर होगी। इस कारण विधेयक प्रतिनिधित्व के ढांचे और निर्वाचन सीमाओं, दोनों पर असर डालता है।

लोकसभा की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव केवल सीटों के विस्तार का मामला नहीं है, बल्कि यह आरक्षण लागू करने के लिए आवश्यक चुनावी पुनर्संरचना से भी जुड़ा है। यदि यह ढांचा आगे बढ़ता है, तो राज्यों और संबंधित केंद्र शासित प्रदेशों में सीटों के पुनर्विन्यास के साथ महिला प्रतिनिधित्व का अनुपात संस्थागत रूप से बढ़ सकता है। इससे राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजनीति में उम्मीदवार चयन, दलगत रणनीति और सामाजिक प्रतिनिधित्व के पैटर्न पर असर पड़ने की संभावना है।

नीतिगत दृष्टि से यह प्रस्ताव संसद और विधानसभाओं की संरचना में बड़े बदलाव का संकेत देता है। सरकार का कहना है कि यदि अगली जनगणना और उसके बाद की प्रक्रिया का इंतजार किया जाता है, तो महिला आरक्षण का वास्तविक लाभ टल सकता है। ऐसे में यह विधेयक चुनावी ढांचे को समायोजित करते हुए आरक्षण को लागू करने का तेज रास्ता तैयार करता है।

राजनीतिक और संस्थागत महत्व

यह पहल ऐसे समय आ रही है जब महिला राजनीतिक भागीदारी को लेकर लंबे समय से संस्थागत सुधार की मांग बनी हुई है। 2023 के कानून के बाद भी उसके वास्तविक क्रियान्वयन की समयसीमा और प्रक्रिया को लेकर सवाल थे, जिन्हें अब नए संशोधन और परिसीमन प्रस्तावों के जरिये संबोधित करने की कोशिश की जा रही है। इस लिहाज से यह कदम केवल संवैधानिक संशोधन नहीं, बल्कि चुनावी प्रशासन का भी बड़ा पुनर्गठन बन सकता है।

लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ने से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधित्व संतुलन पर भी नई बहस शुरू हो सकती है। सीटों की पुनर्रचना का असर राजनीतिक दलों के संसदीय गणित, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और आरक्षित श्रेणियों की हिस्सेदारी पर पड़ेगा। इसलिए विधेयक का महत्व केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक संघीय और संसदीय ढांचे से भी जुड़ा हुआ है।

आगे की दिशा संसद में पेश होने, बहस और पारित होने की प्रक्रिया पर निर्भर करती है। यदि सरकार प्रस्तावित विधायी पैकेज को आगे बढ़ाती है, तो महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के लिए संस्थागत आधार तेजी से तैयार हो सकता है। इससे भारत के चुनावी ढांचे में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव सामने आएगा।

हमारी पिछली रिपोर्ट में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उस चिट्ठी पर चर्चा की गई थी, जिसमें उन्होंने विशेष संसद सत्र के समय और महिलाओं के आरक्षण कानून के क्रियान्वयन को लेकर आपत्ति जताई थी। उस रिपोर्ट में परिसीमन के ब्योरे पर पारदर्शिता, सर्वदलीय परामर्श की मांग, और लोकसभा सीटें बढ़ाकर महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करने वाले संभावित विधायी प्रस्तावों के राजनीतिक व संघीय असर को रेखांकित किया गया था।

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