भारत का मुख्य क्षेत्र मार्च में सिकुड़ा, उर्वरक और ऊर्जा उत्पादन की कमजोरी से वृद्धि दबाव में
भारत के आठ प्रमुख आधारभूत उद्योगों की वृद्धि मार्च में 19 महीने के निचले स्तर पर पहुंचकर -0.4 प्रतिशत हो जाती है। यह गिरावट ऐसे समय में आती है जब उर्वरक, कोयला, कच्चा तेल और बिजली उत्पादन में कमजोरी औद्योगिक गतिविधि के व्यापक रुझान पर दबाव डालती है।
हाइलाइट्स
- मार्च में मुख्य क्षेत्र का संकुचन -1.45 प्रतिशत रहा, उर्वरक उत्पादन में 24.6 प्रतिशत गिरावट और ऊर्जा, कोयला, कच्चे तेल में कमजोरी प्रमुख कारण हैं।
- 2025-26 में मुख्य क्षेत्र की संचयी वृद्धि दर 2.6 प्रतिशत रही, जो 2024-25 की 4.5 प्रतिशत औसत वृद्धि से लगभग आधी है।
- पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने ऊर्जा बाजारों और कमोडिटी सप्लाई शृंखलाओं में अनिश्चितता बढ़ाई, जिससे औद्योगिक जोखिम बने हुए हैं।
मार्च के आंकड़ों में गिरावट के प्रमुख कारण
Forbes India के अनुसार, मार्च में मुख्य क्षेत्र का संकुचन उर्वरक उत्पादन में 24.6 प्रतिशत की तेज गिरावट से सबसे अधिक प्रभावित होता है, जबकि कच्चे तेल, कोयला और बिजली में लगातार कमजोरी समग्र सूचकांक को नीचे खींचती है। अगस्त 2024 में -1.45 प्रतिशत के संकुचन के बाद यह सबसे कमजोर प्रदर्शन माना जाता है।
उर्वरक खंड फरवरी में 3.4 प्रतिशत वृद्धि दर्ज करने के बाद मार्च में तेज उलटफेर के साथ गिरता है। कच्चे तेल का उत्पादन 5.7 प्रतिशत घटता है और कोयला उत्पादन 4 प्रतिशत कम होता है।
करीब 20 प्रतिशत भार वाले बिजली उत्पादन में भी 0.5 प्रतिशत की गिरावट आती है, जो नवंबर 2025 के बाद इसका सबसे कमजोर स्तर है। आठ में से चार उद्योगों का एक साथ नकारात्मक क्षेत्र में जाना इस गिरावट को और अधिक उल्लेखनीय बनाता है।
वित्त वर्ष की रफ्तार और औद्योगिक असर
कमजोरी के बीच कुछ क्षेत्रों में सीमित सहारा भी दिखता है। इस्पात उत्पादन 2.2 प्रतिशत बढ़ता है, सीमेंट 4 प्रतिशत चढ़ता है, प्राकृतिक गैस उत्पादन 6.4 प्रतिशत बढ़ता है, जबकि सबसे अधिक भार वाले पेट्रोलियम रिफाइनरी उत्पादों में 0.1 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी होती है।फिर भी इन सुधारों से व्यापक सुस्ती की भरपाई नहीं हो पाती। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध वैश्विक ऊर्जा बाजारों और कमोडिटी आपूर्ति शृंखलाओं पर अनिश्चितता बनाए रखता है, जिससे भारत के औद्योगिक परिदृश्य पर बाहरी जोखिम बने रहते हैं।
पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में मुख्य क्षेत्र की संचयी वृद्धि दर 2.6 प्रतिशत रहती है, जो पिछले वित्त वर्ष की 4.5 प्रतिशत औसत वृद्धि की तुलना में लगभग आधी है। यह रुझान बताता है कि आधारभूत उद्योगों की गति धीमी पड़ रही है और इसका असर व्यापक औद्योगिक उत्पादन पर पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत सरकार ने सुरक्षा और आर्थिक हितों की समन्वित समीक्षा करते हुए तेल, ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति से जुड़े जोखिमों तथा आपूर्ति शृंखला में बाधा की आशंकाओं पर चर्चा की थी। हमारे पहले के लेख में बताया गया था कि लंबी अवधि तक ऊंची कच्चे तेल की कीमतें भारत की वृद्धि, मुद्रास्फीति और बाहरी संतुलन पर दबाव बढ़ा सकती हैं, जिससे नीति-निर्माताओं के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी।
नवीनतम प्राकृतिक गैस समाचार
- Forex
- Crypto