भारत में आलू कीमत गिरने पर केंद्र ने बाजार हस्तक्षेप कार्यक्रम शुरू किया

भारत में आलू कीमत गिरने पर केंद्र ने बाजार हस्तक्षेप कार्यक्रम शुरू किया
आलू की कीमतों में गिरावट

उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मजबूत फसल संभावनाओं से आपूर्ति बढ़ने के बीच आलू की कीमतों में तेज गिरावट आती है, जिससे केंद्र बाजार हस्तक्षेप कार्यक्रम शुरू करता है। यह कदम ऐसे समय आता है जब थोक और खुदरा दोनों कीमतें सालाना आधार पर नीचे हैं और बाजार में अधिशेष आवक किसानों की प्राप्ति पर दबाव डाल रही है।

हाइलाइट्स

  • सरकार ने आलू कीमतों में गिरावट के बाद 650 रुपये प्रति क्विंटल की दर से 20 लाख टन खरीदने की घोषणा की, जबकि औसत थोक मूल्य 1,417 रुपये है।
  • 2024-25 में आलू उत्पादन 58.57 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल से 2.66% ज्यादा है, जिससे आपूर्ति अधिशेष और दाम पर दबाव बढ़ा।
  • मार्च 2026 में आलू की खुदरा महंगाई सालाना आधार पर 18.98% घटी, जिससे उपभोक्ता लाभान्वित हुए लेकिन किसानों की आमदनी और भंडारण लागत पर असर पड़ा।

खरीद योजना और मूल्य परिदृश्य

Financial Express के अनुसार, सरकार ने आलू की कीमतों में गिरावट के बाद 650 रुपये प्रति क्विंटल की दर से 20 लाख टन आलू खरीदने की घोषणा की है, हालांकि व्यापारियों का कहना है कि यह दर कई मंडियों में मौजूदा बाजार भाव से नीचे है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के मुताबिक रविवार को आलू का अखिल भारतीय औसत थोक मूल्य 1,417 रुपये प्रति क्विंटल है, जो एक साल पहले की तुलना में 22% कम है।

औसत खुदरा कीमत 20.21 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ जाती है, जो सालाना आधार पर 17% की गिरावट दिखाती है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में खुदरा कीमतें फिलहाल 10 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में चलती हैं।

कृषि मंत्रालय का कहना है कि यह कदम उत्तर Pradesh के आलू उत्पादक किसानों को निवेश और उपज पर लाभकारी रिटर्न दिलाने तथा बाजार उतार-चढ़ाव के बीच कम दाम पर मजबूरन बिक्री रोकने के लिए है। लेकिन आगरा के व्यापारियों का कहना है कि 900 से 1,000 रुपये प्रति क्विंटल के मौजूदा भाव के मुकाबले सरकारी खरीद मूल्य किसानों को ज्यादा आकर्षित नहीं कर सकता।

आगरा क्षेत्र में JR cold storage के मालिक श्याम बहादुर चौहान का कहना है कि उत्तर प्रदेश के मथुरा क्षेत्र के कुछ हिस्सों में ही 600 से 700 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में आलू मिल सकता है, जबकि आगरा बेल्ट में भाव इससे ऊपर हैं, भले ही वे पिछले साल से नीचे रहें। उनके अनुसार किसान मार्च से शुरू होने वाली लगभग 10 महीने की भंडारण अवधि के लिए कोल्ड स्टोरेज पर आम तौर पर 260 रुपये प्रति क्विंटल खर्च करते हैं।

भंडारण, अधिशेष आपूर्ति और महंगाई पर असर

कटाई के बाद आलू सामान्यतः फरवरी में कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता है और नवंबर तक घरेलू मांग पूरी करता है, लेकिन इस साल व्यापारियों के मुताबिक स्टॉक जनवरी तक कोल्ड स्टोरेज में बना रहता है, जिससे बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति आ जाती है। अब नई फसल के अगले साल आने तक भंडारित आलू को संतुलित तरीके से बाजार में छोड़ा जाना है, फिर भी मौजूदा अधिशेष आवक कीमतों को नीचे धकेलती है।

कृषि मंत्रालय 2024-25 फसल वर्ष, जुलाई से जून, के लिए आलू उत्पादन 58.57 मिलियन टन रहने का अनुमान देता है, जो सालाना आधार पर 2.66% अधिक है। उत्पादन में यह बढ़ोतरी और बाजार में बढ़ी उपलब्धता मूल्य दबाव को और स्पष्ट करती है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार मार्च 2026 में आलू की खुदरा महंगाई सालाना आधार पर 18.98% घटती है। इससे उपभोक्ताओं को राहत मिलती है, लेकिन उत्पादक क्षेत्रों में किसानों की आय और भंडारण अर्थशास्त्र पर दबाव बढ़ता है।

पश्चिम बंगाल के मखाना उद्योग पर हमारी पिछली रिपोर्ट में बताया गया था कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण निर्यात ऑर्डर घटने से भंडार बढ़ गया और पूरी आपूर्ति शृंखला दबाव में आ गई। इसमें कारोबारियों के हवाले से किसानों, प्रसंस्करण श्रमिकों और व्यापारियों पर पड़ते असर तथा उत्पादन-निर्यात समर्थन और ब्रांड विकास जैसी नीतिगत मदद की बढ़ती मांग को रेखांकित किया गया था।

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