पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मुकाबला कुछ ऐसी सीटों पर सिमटता है जहां जातीय गणित, सीमा संबंधी चिंता और अधूरी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताएं एक साथ असर डालती हैं। 294 सीटों पर 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान हो रहा है, 6.45 करोड़ मतदाता परिणाम को 4 मई को सत्ता, विरासत और क्षेत्रीय वर्चस्व की कसौटी पर तय करते हैं।
हाइलाइट्स
- नंदीग्राम, भवानीपुर, रायगंज और सिलीगुड़ी समेत प्रमुख सीटों पर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच हाई-स्टेक मुकाबले सत्ता संतुलन को प्रभावित करते हैं।
- दिनहाटा, गाईघाटा और बरुईपुर पश्चिम जैसी सीटों पर जातीय, धार्मिक और नागरिकता मुद्दों के कारण बहुकोणीय मुकाबले और क्षेत्रीय ध्रुवीकरण तेज हुए हैं।
- संदेशखाली, भांगर, समसेरगंज में 2024-2025 की हालिया हिंसा और सामाजिक तनाव सीटों को संवेदनशील बनाते हुए तृणमूल और भाजपा दोनों के लिए जोखिम और अवसर पैदा करते हैं।
नंदीग्राम से संदेशखाली तक निर्णायक मुकाबले
Financial Express के अनुसार, नंदीग्राम और भवानीपुर इस चुनाव के सबसे प्रतिष्ठित मुकाबलों में शामिल हैं, जहां तृणमूल कांग्रेस और भाजपा अपनी राजनीतिक पकड़ तथा नेतृत्व की साख की परीक्षा में उतरती हैं। नंदीग्राम में 2021 में सुवेंदु अधिकारी की जीत के बाद यह सीट फिर बदले की लड़ाई का केंद्र बनती है, जबकि दक्षिण कोलकाता का भवानीपुर ममता बनर्जी के शहरी प्रभाव का प्रमुख प्रतीक बना रहता है।
उत्तर बंगाल में दिनहाटा, रायगंज और सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी उच्च दांव वाली सीटों में गिने जाते हैं। दिनहाटा में 41 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति मतदाता मुकाबले को तीखा बनाते हैं, जबकि रायगंज में 42 से 49 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता और बांग्लादेश सीमा से जुड़े CAA और NRC जैसे मुद्दे चुनावी रुझान को प्रभावित करते हैं। सिलीगुड़ी, फुलबाड़ी-डाबग्राम, फांसीदेवा और नक्सलबाड़ी का क्षेत्र रणनीतिक 'चिकन नेक' पट्टी के रूप में गोरखा मांगों, दलगत बदलावों और बहुकोणीय मुकाबलों का केंद्र बनता है।
औद्योगिक और सीमा क्षेत्रों में भी प्रतिस्पर्धा तेज है। आसनसोल दक्षिण कोयला पट्टी के श्रमिक और कारोबारी समीकरणों के कारण अहम बना हुआ है, जबकि खड़गपुर सदर में भाजपा और तृणमूल के बीच शहरी औद्योगिक प्रभाव की लड़ाई दिखती है। बांग्लादेश सीमा से सटी गाईघाटा में मतुआ अनुसूचित जाति वोट और नागरिकता बहस इस सीट को शरणार्थी और पहचान की राजनीति के बड़े परीक्षण में बदलते हैं।
क्षेत्रीय ध्रुवीकरण और सत्ता पर असर
संदेशखाली, भांगर और समसेरगंज जैसी सीटें चुनाव पर सामाजिक तनाव और ध्रुवीकरण का असर दिखाती हैं। संदेशखाली 2024 की हिंसा और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे के कारण राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनी हुई है, भांगर में ISF का प्रभाव तृणमूल के लिए चुनौती बना रहता है, और मुस्लिम बहुल समसेरगंज में 2025 वक्फ अधिनियम से जुड़ी हिंसा भाजपा के लिए अवसर तथा तृणमूल के लिए जोखिम का संकेत देती है।कोलकाता पोर्ट, हावड़ा मध्य और बरुईपुर पश्चिम जैसी शहरी सीटें भी व्यापक चुनावी तस्वीर को आकार देती हैं। कोलकाता पोर्ट में अल्पसंख्यक मतदाता तृणमूल की ताकत माने जाते हैं, हावड़ा मध्य में औद्योगिक ढांचा संगठनात्मक क्षमता की परीक्षा लेता है, और बरुईपुर पश्चिम में भाजपा की बढ़ती हिस्सेदारी बहुकोणीय मुकाबले की संभावना बढ़ाती है।
इसके अलावा कृष्णानगर दक्षिण, डोमकल, माथाभांगा, बहरामपुर, बालुरघाट, दार्जिलिंग और जंगीपुर जैसी सीटें नेतृत्व, जाति, सीमा, संपत्ति और क्षेत्रीय पहचान जैसे विविध कारकों को सामने लाती हैं। इन निर्वाचन क्षेत्रों का संयुक्त असर यह तय कर सकता है कि पश्चिम बंगाल में 2026 का जनादेश किस दल के पक्ष में जाता है और राज्य की अगली राजनीतिक दिशा कैसी बनती है।
हमारे पहले के लेख में पश्चिम बंगाल के दो चरणों के विधानसभा चुनाव से पहले उम्मीदवारों की वित्तीय प्रोफाइल पर ADR के शपथपत्र-आधारित विश्लेषण का सार बताया गया था। रिपोर्ट में सामने आया कि कई उम्मीदवारों पर करोड़ों रुपये की देनदारियां दर्ज हैं, कुछ मामलों में देनदारी घोषित संपत्तियों से भी अधिक है, और ऐसे हाई-लायबिलिटी प्रोफाइल खासकर कोलकाता व उत्तर/दक्षिण 24 परगना जैसे क्षेत्रों में केंद्रित दिखते हैं।
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