भारत का गेहूं उत्पादन मौसमीय दबाव के बीच स्थिर रहने की उम्मीद

भारत का गेहूं उत्पादन मौसमीय दबाव के बीच स्थिर रहने की उम्मीद
गेहूं उत्पादन स्थिर रहेगा

फरवरी की असामान्य गर्मी और पिछले महीने कुछ इलाकों में बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि के बावजूद 2025-26 फसल वर्ष में देश की गेहूं फसल पर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। कृषि मंत्रालय का कहना है कि अधिक रकबा, जल्दी बुआई और बेहतर किस्मों को अपनाने से स्थानीय गुणवत्ता और उपज नुकसान की भरपाई होने की उम्मीद है।

हाइलाइट्स

  • फसल वर्ष 2025-26 में गेहूं उत्पादन का वास्तविक अनुमान 110–120 मिलियन टन पर आ सकता है, पूर्वानुमानित 120.21 मिलियन टन से कम।
  • 2026-27 विपणन सत्र में सरकारी खरीद लक्ष्य 30 मिलियन टन से बढ़ाकर 34.5 मिलियन टन किया गया और अब तक 16.4 मिलियन टन खरीद हो चुकी है।
  • सरकार ने बेमौसम बारिश से प्रभावित गेहूं की खरीद में मानकों में ढील देकर सिकुड़े-टूटे दानों की सीमा 6% से बढ़ाकर 15% कर दी।

फसल आकलन और मौसम का असर

Financial Express की रिपोर्ट के अनुसार, कृषि मंत्रालय ने रविवार को कहा कि फरवरी में असामान्य रूप से ऊंचे तापमान ने गेहूं फसल को हीट स्ट्रेस के संपर्क में ला दिया, जिससे दाना भरने की अवधि और उपज पर दबाव पड़ा। मंत्रालय ने यह भी कहा कि पिछले महीने परिपक्वता के समय कुछ क्षेत्रों में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से दाने की गुणवत्ता और उपज को स्थानीय स्तर पर नुकसान पहुंचा है।

मंत्रालय के पहले के अनुमान के अनुसार 2025-26 फसल वर्ष, जुलाई से जून, में गेहूं उत्पादन 120.21 मिलियन टन रहने का अनुमान था, जो 2024-25 के 117.95 मिलियन टन से अधिक है। हालांकि, खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने पिछले सप्ताह एक कार्यक्रम में कहा था कि 120 मिलियन टन का अनुमान बारिश से पहले का था और वास्तविक उत्पादन 110 मिलियन टन से 120 मिलियन टन के बीच रह सकता है।

रोलर एंड फ्लोर मिलर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने एजेंसी Agri-Watch के सर्वे के आधार पर चालू फसल वर्ष का गेहूं उत्पादन 110.65 मिलियन टन आंका है, जो पिछले वर्ष के 109.63 मिलियन टन से थोड़ा अधिक है। मंत्रालय के नोट के मुताबिक, 33.4 मिलियन हेक्टेयर अनुमानित क्षेत्र में बोई गई गेहूं फसल में इस मौसम के दौरान कीट और रोगों की कोई घटना नहीं दिखी। अतिरिक्त 0.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को स्थानीय नुकसान की आंशिक भरपाई करने वाला कारक माना जा रहा है।

मंत्रालय ने मौजूदा गेहूं मौसम को मिश्रित लेकिन लचीला बताया है, जिस पर जलवायु संबंधी प्रतिकूलताओं के साथ किसानों के अनुकूलन उपायों का भी असर है। फेडरेशन के सर्वे के अनुसार, मार्च के आखिर और अप्रैल 2026 की शुरुआत में बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और कटाई के दौरान खुले में फसल रहने से पंजाब और पश्चिम बंगाल सबसे अधिक प्रभावित हुए, जबकि हरियाणा, बिहार और राजस्थान पर मध्यम असर पड़ा।

खरीद नीति और बाजार पर असर

सरकारी एजेंसियां 2026-27 विपणन सत्र, अप्रैल से जून, के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अब तक 16.4 मिलियन टन गेहूं खरीद चुकी हैं। खाद्य मंत्रालय ने खरीद लक्ष्य को पहले के 30 मिलियन टन से बढ़ाकर 34.5 मिलियन टन कर दिया है।

हाल में खाद्य मंत्रालय ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में बेमौसम बारिश से प्रभावित गेहूं की खरीद के मानकों में ढील दी है। इसके तहत सिकुड़े और टूटे दानों की स्वीकार्य सीमा 6% से बढ़ाकर 15% की गई है, जबकि चमक कम होने की सीमा 70% तक मंजूर की गई है।

यह रुख संकेत देता है कि सरकार गुणवत्ता संबंधी स्थानीय नुकसान के बावजूद सार्वजनिक खरीद को मजबूत रखकर आपूर्ति संतुलन बनाए रखना चाहती है। यदि व्यापक उत्पादन स्थिर रहता है और खरीद बढ़ती है, तो आटा मिलिंग और खाद्य आपूर्ति शृंखला के लिए कच्चे माल की उपलब्धता पर दबाव सीमित रह सकता है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में कमजोर मानसून के अनुमान और एल नीनो के जोखिम पर चर्चा की गई थी, और बताया गया था कि इससे खरीफ उत्पादन के साथ-साथ खाद्य मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ सकता है। लेख में पश्चिम एशिया के युद्ध के चलते उर्वरक, ईंधन और पैकेजिंग जैसी इनपुट लागतों में बढ़ोतरी को भी रेखांकित किया गया था, जो ग्रामीण मांग और उपभोग को प्रभावित कर सकती है।

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