भारत का waste-to-energy क्षेत्र ईंधन संकट के बीच तेज रुचि आकर्षित करता है

भारत का waste-to-energy क्षेत्र ईंधन संकट के बीच तेज रुचि आकर्षित करता है
ईंधन संकट में नया आकर्षण

पश्चिम एशिया के संघर्ष और LPG आपूर्ति संकट के बीच भारत में कचरे से ईंधन बनाने वाली कंपनियां ग्राहकों, निवेशकों और उद्योग भागीदारों की बढ़ती दिलचस्पी देख रही हैं। यह रुझान ऐसे समय उभर रहा है जब देश आयातित जीवाश्म ईंधन और उर्वरकों पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए biofuels पारिस्थितिकी तंत्र को विस्तार देने की कोशिश कर रहा है।

हाइलाइट्स

  • पश्चिम एशिया में संघर्ष और LPG की कमी के कारण Carbon Masters, Ecoil और अन्य waste-to-energy कंपनियों को उपभोक्ता और निवेशकों से मांग में तेज वृद्धि देखने को मिली।
  • सरकारी पहलें जैसे SATAT और CBG blending obligations ने waste-to-biofuel उद्योग को मजबूत संस्थागत समर्थन दिया, हालांकि चालू संयंत्रों की संख्या अभी भी 2030 के लक्ष्य से पीछे है।
  • International Energy Agency का अनुमान है कि सही नीति समर्थन मिलने पर 2030 तक भारत में liquid और gaseous biofuels की मांग तेज़ी से बढ़ सकती है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और स्थानीय रोजगार को प्रोत्साहन मिलेगा।

संकट के बीच मांग और निवेश रुचि

Forbes India के अनुसार, बेंगलुरु स्थित Carbon Masters कहती है कि पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद कई हफ्तों तक उसके पास लगातार पूछताछ आती रहीं, क्योंकि रेस्तरां और औद्योगिक ग्राहक LPG की कमी के बीच वैकल्पिक ईंधन तलाश रहे हैं। कंपनी biomethane, या compressed bio gas, की आपूर्ति कर रही है और उसका कहना है कि उसके ईंधन का उपयोग करने वाले कुछ खाद्य व्यवसाय बिना रुकावट संचालन जारी रख रहे हैं।

कंपनी के सह-संस्थापक Som Narayan और Kevin Houston का कहना है कि रुचि केवल छोटे उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े विनिर्माता भी ऐसे संयंत्रों के लिए विकल्प खोज रहे हैं जो LPG सिलेंडर की कमी से प्रभावित हैं। इसी तरह, used cooking oil को biodiesel में बदलने वाली Ecoil का कहना है कि उसे उपभोक्ता मांग से अधिक निवेशकों की पूछताछ मिल रही है।

यह बढ़ती रुचि Hormuz जलडमरूमध्य में व्यवधान और ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी की पृष्ठभूमि में है। लेख में कहा गया है कि दुनिया के तेल और गैस का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है, इसलिए आपूर्ति जोखिम ने भारत में biofuels और waste-to-energy मॉडलों की व्यावसायिक प्रासंगिकता को अधिक स्पष्ट कर दिया है।

Carbon Masters का मॉडल जैविक कचरे से biogas बनाकर उसे उच्च शुद्धता वाले biomethane में बदलने पर आधारित है, जिसका उपयोग cooking, heating और transport में LPG, diesel या CNG के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। कंपनी के लिए एक अतिरिक्त राजस्व स्रोत organic manure है, जबकि आगे carbon credits से कमाई की संभावना भी देखी जा रही है।

नीतिगत समर्थन और क्षेत्रीय असर

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस की जरूरतों का करीब आधा हिस्सा आयात करता है, जबकि urea और DAP जैसे उर्वरकों में भी आयात पर उल्लेखनीय निर्भरता बनी हुई है। इस कारण biofuels क्षेत्र को केवल स्वच्छ ऊर्जा विकल्प नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक लागत और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र माना जा रहा है।

GPS Renewables, Farmwatt Innovations और Ecoil जैसी कंपनियां इस व्यापक शृंखला के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रही हैं, जिनमें feedstock aggregation, plant engineering, fuel production और waste collection शामिल हैं। SATAT जैसी सरकारी नीतियों और CBG blending obligations ने इस क्षेत्र को संस्थागत आधार दिया है, हालांकि लेख के मुताबिक 2030 के लक्ष्य के मुकाबले चालू संयंत्रों की संख्या अभी भी सीमित है।

International Energy Agency के अनुमान का हवाला देते हुए लेख कहता है कि सही नीतिगत कदमों के साथ भारत में liquid और gaseous biofuels की मांग 2030 तक तेज बढ़ सकती है। इससे ग्रामीण रोजगार, कृषि अपशिष्ट के उपयोग, नगर कचरा प्रबंधन और स्थानीय आपूर्ति शृंखलाओं को बढ़ावा मिलने की संभावना है।

निवेशक भी अब इस क्षेत्र को केवल जलवायु या परिपत्र अर्थव्यवस्था की दृष्टि से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा स्वतंत्रता के नजरिये से देख रहे हैं। मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव ने इस धारणा को मजबूत किया है कि स्थानीय रूप से उत्पादित biofuels मूल्य स्थिरता, आपूर्ति सुरक्षा और आयात बिल में कमी, तीनों मोर्चों पर भारत के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हमारी पिछली रिपोर्ट में होरमुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजरानी की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता बहाल करने की भारत की अपील पर चर्चा की गई थी। इसमें बताया गया था कि इस अहम समुद्री मार्ग में व्यवधान से वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और मानवीय आपूर्ति शृंखलाओं पर व्यापक असर का जोखिम बढ़ता है, साथ ही समुद्र में फंसे नाविकों और चालक दल की सुरक्षा को लेकर चिंता भी सामने आई थी।

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