भारत की बाह्य क्षेत्रीय स्थिरता पर पश्चिम एशिया संकट का दबाव बढ़ा, सीईए ने BoP जोखिम रेखांकित किया
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत के लिए चालू वित्त वर्ष में बाह्य क्षेत्रीय दबाव का बड़ा परीक्षण बन रहा है, क्योंकि तेल, एलपीजी और प्रेषण के मोर्चे पर देश की निर्भरता जोखिम बढ़ा रही है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन का कहना है कि महंगाई, चालू खाते के घाटे, भुगतान संतुलन और रुपये पर इसका सीधा असर पड़ रहा है, हालांकि भारत की व्यापक आर्थिक बुनियाद कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं से मजबूत बनी हुई है।
हाइलाइट्स
- पश्चिम एशिया संकट के चलते भारत का चालू खाता घाटा FY26 के लगभग 0.8% से बढ़कर FY27 में 2% के ऊपर जाने की संभावना जताई गई।
- 28 फरवरी से होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने, कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल और टैंकर यातायात गिरने से भारत की ऊर्जा आयात लागत व BoP जोखिम बढ़े।
- रुपया मंगलवार को U.S. डॉलर के मुकाबले 95.6 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा और Q1FY27 में सरकारी तेल कंपनियों को 2 लाख करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी की आशंका है।
भुगतान संतुलन और ऊर्जा आयात पर बढ़ता दबाव
Financial Express के अनुसार, भारतीय उद्योग परिसंघ के वार्षिक बिजनेस समिट में बोलते हुए नागेश्वरन ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट अब केवल भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत के लिए "लाइव बैलेंस ऑफ पेमेंट्स स्ट्रेस टेस्ट" बन गया है। उन्होंने कहा कि FY27 की केंद्रीय व्यापक आर्थिक प्राथमिकताएं चालू खाते का भरोसेमंद प्रबंधन, उसके वित्तपोषण की व्यवस्था और मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव को रोकना हैं।
उन्होंने कहा कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 87% आयात करता है, जिसमें लगभग 46% आपूर्ति रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर या उसके निकट से गुजरती है। उनके मुताबिक इस मार्ग से टैंकर यातायात में तेज गिरावट आई है, जबकि भारत की एलपीजी जरूरत का 60% आयातित है और उसमें 90% से अधिक आपूर्ति खाड़ी क्षेत्र से आती है।
संकट U.S.-इजराइल और ईरान से जुड़े टकराव के बाद 28 फरवरी से होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावी रूप से बंद होने के साथ और गहरा गया है, जिससे वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें उछल रही हैं। इससे भारत का आयात बिल बढ़ने, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आने और चालू खाते के घाटे के FY26 के लगभग 0.8% से बढ़कर FY27 में 2% से ऊपर जाने का अनुमान जताया गया है।
बाहरी दबावों के बीच मंगलवार को रुपया U.S. डॉलर के मुकाबले 95.6 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। विभिन्न आकलनों के अनुसार, खुदरा ईंधन कीमतों पर परोक्ष सरकारी नियंत्रण के कारण सरकारी तेल विपणन कंपनियों को Q1FY27 में 2 लाख करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ सकता है।
वृहद अर्थव्यवस्था की मजबूती और एमएसएमई भुगतान पर जोर
नागेश्वरन ने कहा कि राजकोषीय समेकन, बुनियादी ढांचा निवेश और सुधारों की दिशा भारत को इस झटके से निपटने के लिए एक विश्वसनीय आधार देती है। उनके अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था अब "भूराजनीतिक-आर्थिक विखंडन" के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां व्यापार युद्ध, प्रौद्योगिकी विभाजन, निर्यात नियंत्रण और लगातार ऊंचे भू-राजनीतिक जोखिम नई सामान्य स्थिति बन रहे हैं।उन्होंने कहा कि भारत अपने आकार, लोकतांत्रिक वैधता और व्यापक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कारण आने वाले वैश्विक आर्थिक ढांचे को आकार देने की बेहतर स्थिति में है। साथ ही, उन्होंने बड़ी कंपनियों से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की अपील की, यह कहते हुए कि भुगतान में देरी से छोटे कारोबारों पर कार्यशील पूंजी का दबाव और उधारी लागत दोनों बढ़ते हैं।
नागेश्वरन ने कहा कि एमएसएमई बड़े उद्यमों के लिए कार्यशील पूंजी का स्रोत नहीं बनने चाहिए, बल्कि स्थिति इसका उलटा होना चाहिए। उनके मुताबिक तेज भुगतान चक्र नवाचार को सहारा देंगे और एमएसएमई को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में अधिक प्रभावी ढंग से जुड़ने में मदद करेंगे।
हमारी पिछली रिपोर्ट में पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच सरकार द्वारा संभावित मितव्ययिता कदमों और ईंधन/विदेशी यात्रा जैसे खर्चों में कटौती की तैयारियों पर चर्चा की गई थी। उस लेख में होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी आपूर्ति अनिश्चितता के चलते तेल कीमतों, रुपये, विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते पर बढ़ते दबाव के संकेतों के साथ तेल विपणन कंपनियों की अंडर-रिकवरी के अनुमान भी बताए गए थे।
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