केरल ने सिल्वरलाइन रेल परियोजना खत्म की, भूमि अधिग्रहण नोटिफिकेशन वापस होंगे
केरल सरकार पिछली एलडीएफ सरकार के दौर में प्रस्तावित विवादित सिल्वरलाइन अर्ध-उच्च गति रेल कॉरिडोर को छोड़ने का फैसला करती है। इसके साथ राज्य मंत्रिमंडल परियोजना से जुड़े भूमि अधिग्रहण नोटिफिकेशन रद्द करने और प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों की वापसी की सिफारिश करने का निर्णय भी लेता है।
हाइलाइट्स
- केरल कैबिनेट ने सिल्वरलाइन या K-Rail परियोजना को औपचारिक रूप से समाप्त करने और सभी भूमि अधिग्रहण नोटिफिकेशन वापस लेने का निर्णय लिया।
- 529 किलोमीटर लंबी अर्ध-उच्च गति रेल परियोजना को केवल सैद्धांतिक केंद्रीय मंज़ूरी मिली थी, जबकि कई पर्यावरणीय और प्रशासनिक स्वीकृतियां लंबित थीं।
- विपक्षी दलों के समर्थन वाले बड़े पैमाने के विरोध, सामाजिक-पर्यावरणीय चिंताओं और वित्तीय व्यवहार्यता पर उठे सवालों के बाद परियोजना रद्द कर दी गई।
कैबिनेट फैसले और परियोजना की स्थिति
PTI की रिपोर्ट के अनुसार, Financial Express की एक खबर में बताया गया है कि मुख्यमंत्री वी डी सतीशन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के बाद सरकार सिल्वरलाइन, या K-Rail, परियोजना को औपचारिक रूप से समाप्त करने का निर्णय घोषित करती है। राज्य मंत्रिमंडल यह भी तय करता है कि परियोजना के लिए जारी सभी भूमि अधिग्रहण नोटिफिकेशन वापस लिए जाएंगे, जबकि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने की सिफारिश की जाएगी, हालांकि अंतिम फैसला अदालतों के हाथ में रहता है।529 किलोमीटर लंबी यह अर्ध-उच्च गति रेल लाइन तिरुवनंतपुरम को कासरगोड से जोड़ने के लिए प्रस्तावित थी। योजना के तहत 11 जिलों से होकर गुजरने वाले इस कॉरिडोर पर ट्रेनें 200 किमी प्रति घंटे तक की रफ्तार से चलने वाली थीं, और यात्रा समय करीब 12 घंटे से घटकर लगभग चार घंटे होने का दावा किया गया था।
इस परियोजना को Kerala Rail Development Corporation Limited के जरिए लागू किया जाना था, जो केरल सरकार और केंद्रीय रेल मंत्रालय का संयुक्त उपक्रम है। हालांकि, केंद्र ने पहले केवल सैद्धांतिक मंजूरी दी थी और कई पर्यावरणीय तथा प्रशासनिक स्वीकृतियां अभी लंबित रहती हैं।
विरोध, वित्तीय चिंताएं और क्षेत्रीय असर
भूमि अधिग्रहण और सामाजिक प्रभाव आकलन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद परियोजना के खिलाफ राज्य के कई हिस्सों में व्यापक विरोध उभरता है। कांग्रेस और बीजेपी समेत विपक्षी दल स्थानीय आंदोलनों का समर्थन करते हैं, जबकि आलोचक बड़े पैमाने पर विस्थापन, पर्यावरणीय नुकसान और परियोजना की वित्तीय व्यवहार्यता पर गंभीर सवाल उठाते हैं।कार्यकर्ताओं का कहना रहा है कि प्रस्तावित मार्ग धान के खेतों, आर्द्रभूमि और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरता है। विरोधियों ने यह भी तर्क दिया कि जबरन भूमि अधिग्रहण से हजारों परिवार प्रभावित हो सकते हैं और यह परियोजना राज्य के कर्ज बोझ को और बढ़ा सकती है।
पूर्व दिल्ली मेट्रो प्रमुख ई. श्रीधरन भी इस प्रस्ताव को पहले "दूरदर्शिता से रहित" बता चुके हैं और इसकी योजना तथा क्रियान्वयन पर प्रश्न उठा चुके हैं। परियोजना को खत्म करने का ताजा फैसला केरल में बुनियादी ढांचा निवेश, भूमि उपयोग और परिवहन आधुनिकीकरण के बीच संतुलन पर चल रही बहस को नई दिशा देता है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में केरल की नई UDF सरकार द्वारा राज्य की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र लाने के फैसले और इसके लिए पूर्व कैबिनेट सचिव डॉ. के.एम. चंद्रशेखर की अध्यक्षता में समिति गठित करने पर बताया गया था। उसी कैबिनेट बैठक के बाद सरकार ने SIT गठन और कुछ कल्याणकारी घोषणाओं सहित शुरुआती प्रशासनिक प्राथमिकताएं भी स्पष्ट की थीं, जो आगे चलकर बुनियादी ढांचा और खर्च से जुड़े बड़े फैसलों के संदर्भ को समझने में मदद करती हैं।
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