S&P के अनुसार एआई दबाव के बीच भारतीय आईटी कंपनियों पर असर असमान रहने की आशंका
भारत की बड़ी आईटी सेवा कंपनियां ऐसे कारोबारी बदलाव का सामना कर रही हैं, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता से राजस्व वृद्धि, मूल्य निर्धारण और रोजगार पर अलग-अलग असर पड़ने की संभावना है। S&P Global Ratings का कहना है कि TCS, Infosys, HCL Technologies और Wipro जैसी बड़ी कंपनियां अपने पैमाने, विविध ग्राहक आधार और मजबूत नकदी स्थिति के कारण इस बदलाव को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से संभाल सकती हैं।
हाइलाइट्स
- S&P Global Ratings के अनुसार, भारतीय आईटी कंपनियों पर एआई दबाव अगले 12–24 महीनों में बढ़ेगा, जिससे राजस्व दृश्यता कमजोर हो सकती है।
- Infosys, HCL Tech और Wipro की राजस्व वृद्धि FY27–FY28 में 2–4 प्रतिशत पर रहने की संभावना है, जो FY26 के 4–6 प्रतिशत से कम है।
- Infosys ने FY26 में लगभग $2 अरब और Wipro ने FY27 में लगभग $1.6 अरब का बायबैक किया, जबकि छोटी कंपनियां AI पर केंद्रित बड़े अधिग्रहण कर रही हैं।
रिपोर्ट के निष्कर्ष और राजस्व दबाव की समयरेखा
Forbes India के अनुसार, S&P Global Ratings की सोमवार को प्रकाशित रिपोर्ट कहती है कि भारतीय आईटी सेवा क्षेत्र पर एआई का दबाव अगले 12 से 24 महीनों में अधिक स्पष्ट हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अभी इन कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा क्लाउड आधारित डिजिटल परिवर्तन और परामर्श कार्य से आता है, जो दीर्घकालिक अनुबंधों के तहत होने के कारण एआई से तत्काल प्रतिस्थापन के जोखिम से कुछ हद तक सुरक्षित है।
फिर भी, S&P का आकलन है कि एआई-नेेटिव प्रतिस्पर्धियों के उभरने और अपनाने के चक्र छोटे होने से अगले तीन वर्षों में राजस्व दृश्यता कमजोर हो सकती है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि कमजोर व्यापक आर्थिक परिस्थितियां और छोटे प्रौद्योगिकी बजट दबाव बढ़ा रहे हैं, और इसी तरह का रुझान Accenture में भी दिखता है, जिसने अपने पूरे वर्ष के राजस्व मार्गदर्शन में कटौती की है।
S&P का अनुमान है कि Infosys, HCL Tech और Wipro की राजस्व वृद्धि FY27 और FY28 में 2 से 4 प्रतिशत रहेगी, जो FY26 के 4 से 6 प्रतिशत से कम है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि Infosys और Wipro ने FY23 के बाद से 5 से 6 प्रतिशत कर्मचारियों की कटौती की है, जबकि TCS और Tech Mahindra में भी ऐसे रुझान दिखाई देते हैं।
साथ ही, इन-हाउस ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स, GCCs, की बढ़ती मांग कुछ आउटसोर्सिंग राजस्व को अपने भीतर खींच सकती है। इसके बावजूद, बड़ी आईटी कंपनियां खुद को ऐसे भागीदार के रूप में स्थापित कर रही हैं जो इन केंद्रों के निर्माण और संचालन में ग्राहकों की मदद कर सकती हैं।
मार्जिन, पूंजी आवंटन और अधिग्रहण रणनीति
S&P के अनुसार, उद्योग औसत से ऊपर बने हुए मार्जिन में बहुत अधिक सुधार की गुंजाइश सीमित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फिक्स्ड-प्राइस अनुबंधों की ओर झुकाव और श्रम लागत के उस लाभ पर दबाव, जिसने लंबे समय तक लाभप्रदता को सहारा दिया, आगे मार्जिन पर असर डाल सकता है।एजेंसी का कहना है कि भारत की शीर्ष आईटी कंपनियां अगले दो वर्षों में बेहतर कर्मचारी उपयोग और कौशल उन्नयन के जरिए औसत से ऊपर के मार्जिन बचाए रख सकती हैं, हालांकि प्रतिभा की कमी पूरी करने के लिए महंगे सबकॉन्ट्रैक्टर्स पर अधिक निर्भरता बढ़ सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, पहले कंपनियां बढ़ी लागत ग्राहकों तक पहुंचाने में सक्षम रही हैं, लेकिन कड़ी प्रतिस्पर्धा और सीमित बजट अब मार्जिन सुधार को रोक सकते हैं।
पूंजी आवंटन के मोर्चे पर S&P कहता है कि इन कंपनियों ने सतर्क, लगभग कर्ज-मुक्त बैलेंस शीट बनाए रखी हैं और उनकी वित्तीय नीति मुक्त नकदी प्रवाह से जुड़ी है। हाल के वर्षों में बड़े अधिग्रहण कम होने से अतिरिक्त नकदी का बड़ा हिस्सा शेयरधारकों को लौटाया गया है, जिसमें Infosys ने FY26 में लगभग 2 अरब डॉलर के शेयर वापस खरीदे और Wipro ने FY27 में करीब 1.6 अरब डॉलर का बायबैक किया।
रिपोर्ट आगे कहती है कि एआई के उभार से विकास पर होने वाले खर्च की दिशा बदल सकती है। पिछले चार वर्षों में Infosys, HCL Tech और Wipro ने मुख्य रूप से छोटे, क्षमता बढ़ाने वाले अधिग्रहण किए हैं, जबकि 2 अरब डॉलर से कम राजस्व वाली छोटी कंपनियां अपेक्षाकृत बड़े सौदों की ओर बढ़ रही हैं। पिछले तीन महीनों में Coforge ने लगभग 2.4 अरब डॉलर में AI software firm Encore Digital को खरीदने पर सहमति दी, जबकि Persistent Systems ने Germany की Nagarro के लिए लगभग 1.5 अरब डॉलर के सौदे की घोषणा की। S&P का मानना है कि छोटी कंपनियों में एआई केंद्रित बड़े अधिग्रहण की यह प्रवृत्ति जारी रह सकती है, जिससे विक्रेता एकीकरण और एआई क्षमताएं बढ़ाने की दौड़ तेज हो सकती है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में भारत में Global Capability Centres (GCCs) के तेज विस्तार और उनकी बदलती भूमिका पर चर्चा की गई थी। उसमें बताया गया था कि GCCs अब पारंपरिक कम लागत वाले बैक-ऑफिस से आगे बढ़कर AI-first मॉडल, डेटा, इंजीनियरिंग और उत्पाद विकास जैसे उच्च-मूल्य कार्यों के केंद्र बन रहे हैं, साथ ही सरकार Tier II-III शहरों तक विस्तार और नीतिगत समर्थन (जैसे transfer-pricing safe harbour) को भी आगे बढ़ा रही है।
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