पश्चिम एशिया संकट, ऊंची कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी पूंजी निकासी के बीच भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसलता है। सोना और चांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने के बावजूद बाजार संकेत देते हैं कि यह कदम चालू खाते और भुगतान संतुलन पर बने व्यापक दबाव को तुरंत कम नहीं करता।
हाइलाइट्स
- बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.81 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा, इस साल अब तक 6.11 प्रतिशत गिरा।
- FY25-26 में सोना-चांदी का आयात 26.7 प्रतिशत बढ़कर 102.5 अरब डॉलर तक पहुंचा, कुल आयात में हिस्सेदारी 14 प्रतिशत हुई।
- कच्चे तेल की हर $10/बैरल बढ़ोतरी खुदरा मुद्रास्फीति में 45 बेसिस प्वाइंट और चालू खाते के घाटे में 30-40 बेसिस प्वाइंट बढ़ा सकती है।
मुद्रा पर दबाव और नीति विकल्प
Forbes India की रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.81 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिरता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सोना और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाने का असर सीमित रह सकता है। Barclays के एशिया फॉरेक्स और ईएम मैक्रो स्ट्रैटेजी प्रमुख Mitul Kotecha का कहना है कि इस बढ़ोतरी से शुरुआती राहत मिलती है, लेकिन मुद्रा पर मूलभूत दबाव कम नहीं होता, खासकर तब जब ऊंची तेल कीमतें और व्यापार घाटे की चिंता बनी रहती है।
विश्लेषकों का कहना है कि रुपये की कमजोरी कई परतों वाली समस्या है। Kotak Securities के Anindya Banerjee के अनुसार, ऊंचा तेल आयात बिल और विदेशी संस्थागत निवेशकों की निकासी डॉलर की मांग बढ़ाती है, जबकि RBI ऊंचे स्तरों पर हस्तक्षेप कर सकता है। इस साल अब तक रुपया 6.11 प्रतिशत गिरता है और मई में ही 0.8 प्रतिशत कमजोर होता है, जबकि पिछले एक वर्ष में इसकी गिरावट 11 प्रतिशत तक पहुंचती है।
CareEdge और Tata Mutual Fund के विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग व्यवधान और सुरक्षित निवेश के रूप में U.S. डॉलर की मांग एशियाई मुद्राओं पर अतिरिक्त दबाव डालती है। DBS Bank की वरिष्ठ अर्थशास्त्री Radhika Rao के अनुसार, तेल कीमतों में तेज गिरावट या पोर्टफोलियो प्रवाह की वापसी के बिना रुपये में टिकाऊ सुधार मुश्किल है। वह यह भी कहती हैं कि पारंपरिक दर वृद्धि के बजाय सरकार और RBI विदेशी निवेशकों पर विदहोल्डिंग टैक्स में राहत, राज्य बैंकों द्वारा हेज्ड विदेशी मुद्रा बॉन्ड जारी करने और अनिवासी जमा आकर्षित करने जैसे उपायों पर विचार कर सकते हैं।
मुद्रास्फीति, बॉन्ड यील्ड और इक्विटी बाजार पर असर
रुपये की गिरावट का असर केवल विनिमय दर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आयातित मुद्रास्फीति, चालू खाते, विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय स्थिति पर भी पड़ता है। Tata Mutual Fund के अनुसार, कच्चे तेल में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी खुदरा मुद्रास्फीति में 45 बेसिस प्वाइंट जोड़ सकती है और चालू खाता घाटा 30 से 40 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ा सकती है। अप्रैल में खुदरा मुद्रास्फीति 3.48 प्रतिशत रहती है, लेकिन QuantEco Research का मानना है कि ऊर्जा, मालभाड़ा, हवाई किराए, प्रसंस्कृत खाद्य और FMCG पैकेजिंग लागत में दबाव धीरे-धीरे उपभोक्ता कीमतों में दिख सकता है।Barclays की Aastha Gudwani के अनुसार, सोना और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाने से शीर्षक CPI में 10 बेसिस प्वाइंट तक का इजाफा हो सकता है। FY25-26 में सोना और चांदी का आयात 26.7 प्रतिशत बढ़कर 102.5 अरब डॉलर तक पहुंचता है, जिससे कुल आयात में इनकी हिस्सेदारी 14 प्रतिशत हो जाती है। सरकार ने इससे पहले जुलाई 2022 में भी सोने पर बुनियादी सीमा शुल्क बढ़ाया था, जिसके बाद आयात मात्रा में तेज गिरावट आई थी, हालांकि जुलाई 2024 में शुल्क घटाया गया था।
बॉन्ड बाजार में 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.9 प्रतिशत से 7.1 प्रतिशत के दायरे में झूलती है, जबकि छोटी अवधि की प्रतिभूतियां अपेक्षाकृत स्थिर रहती हैं। Quant Mutual Fund की Sneha Pandey का कहना है कि यदि कच्चा तेल महंगा बना रहता है या रुपया और कमजोर होता है, तो लंबी अवधि की यील्ड पर ऊपर की ओर जोखिम बना रहता है।
इक्विटी बाजार में तस्वीर मिश्रित है। अप्रैल में Sensex और Nifty में 7 प्रतिशत से अधिक की तेजी के बावजूद मई में रुख नरम रहता है। Morgan Stanley के Riddham Desai भारतीय शेयरों पर आगे के लिए आशावादी हैं और मानते हैं कि आय वृद्धि, पूंजीगत व्यय और नीतिगत सहारे से बाजार को बल मिल सकता है। दूसरी ओर, Goldman Sachs के Timothy Moe का कहना है कि उत्तर एशियाई बाजारों की तुलना में भारत का जोखिम-प्रतिफल अनुपात कम आकर्षक दिखता है, क्योंकि ऊंचे वैल्यूएशन, AI से जुड़ी चिंताएं और लंबा खिंचता पश्चिम एशिया युद्ध विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ा सकता है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण भारत के बाह्य क्षेत्र पर बढ़ते दबाव—खासकर कच्चे तेल व एलपीजी आयात निर्भरता, होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान और इसके असर से भुगतान संतुलन व चालू खाते के जोखिम—पर चर्चा की गई थी। इसमें रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर तक फिसलने, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और सरकारी तेल कंपनियों की संभावित अंडर-रिकवरी जैसी चिंताओं को भी रेखांकित किया गया था। यह पृष्ठभूमि बताती है कि भू-राजनीतिक झटके कैसे मुद्रा और नीति विकल्पों को सीमित कर सकते हैं।
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