आरबीआई ने आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक पर जुर्माना लगाया
भारतीय रिजर्व बैंक ने आंध्र प्रदेश के The Chittoor District Co-operative Central Bank Ltd. पर 1 लाख रुपये का मौद्रिक जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई 15 जून 2026 के आदेश के तहत बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के प्रावधानों के उल्लंघन और निदेशक से जुड़े ऋण स्वीकृत करने के मामले में की गई है।
हाइलाइट्स
- आरबीआई ने आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक पर बैंकिंग विनियमन अधिनियम के उल्लंघन पर मौद्रिक दंड लगाया।
- NABARD के निरीक्षण के बाद, निदेशक से जुड़े ऋण स्वीकृत करने के आरोप में कारण बताओ नोटिस देकर आरबीआई ने नियामकीय कार्रवाई की।
- यह कदम सहकारी बैंकों की बोर्ड स्तर की निगरानी व ऋण स्वीकृति प्रक्रियाओं में अनुपालन सख्ती की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
निरीक्षण और नियामकीय कार्रवाई
RBI की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह जुर्माना बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 20 को धारा 56 के साथ पढ़े जाने वाले प्रावधानों के उल्लंघन पर लगाया गया है। केंद्रीय बैंक ने यह कार्रवाई धारा 47A(1)(c), धारा 46(4)(i) और धारा 56 के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए की है.
नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट, NABARD, ने बैंक की 31 मार्च 2025 की वित्तीय स्थिति के संदर्भ में वैधानिक निरीक्षण किया था। पर्यवेक्षी निष्कर्षों और संबंधित पत्राचार के आधार पर बैंक को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें पूछा गया कि संबंधित प्रावधानों का पालन न करने पर उस पर दंड क्यों न लगाया जाए.
बैंक के लिखित जवाब और व्यक्तिगत सुनवाई में दिए गए मौखिक प्रस्तुतिकरण पर विचार करने के बाद आरबीआई ने पाया कि बैंक ने निदेशक से जुड़े ऋण स्वीकृत किए थे। इसी आरोप को कायम मानते हुए मौद्रिक दंड लगाया गया।
सहकारी बैंकिंग क्षेत्र पर असर
केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि यह कार्रवाई वैधानिक अनुपालन में कमियों के आधार पर की गई है और इसका उद्देश्य बैंक तथा उसके ग्राहकों के बीच हुए किसी लेनदेन या समझौते की वैधता पर निर्णय देना नहीं है। आरबीआई ने यह भी कहा है कि यह जुर्माना आगे की किसी अन्य संभावित नियामकीय कार्रवाई पर रोक नहीं लगाता.यह कदम सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लिए अनुपालन मानकों के महत्व को रेखांकित करता है, खासकर संबंधित पक्षों को ऋण देने जैसे संवेदनशील मामलों में। आंध्र प्रदेश सहित क्षेत्रीय सहकारी बैंकों पर इससे शासन, ऋण स्वीकृति प्रक्रियाओं और बोर्ड स्तर की निगरानी को और सख्त रखने का दबाव बढ़ सकता है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में उर्वरक लागत में बढ़ोतरी से भारत के सब्सिडी ढांचे और सरकारी सब्सिडी बिल पर बढ़ते वित्तीय दबाव की चर्चा की गई थी। उसमें बताया गया था कि कीमतें बढ़ने पर सरकार के सामने किसानों के लिए समर्थन बढ़ाने या बढ़ी हुई इनपुट लागत का कुछ भार किसानों पर आने देने जैसी कठिन नीतिगत चुनौतियां खड़ी होती हैं। साथ ही, इस रुझान के बुवाई निर्णय, फसल लागत और ग्रामीण आय पर व्यापक असर की ओर भी संकेत किया गया था।
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