लोकसभा ने कॉरपोरेट कानून संशोधन विधेयक को जेपीसी के पास भेजा
लोकसभा में सोमवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के प्रस्ताव पर कॉरपोरेट लॉज, संशोधन विधेयक 2026 को विस्तृत समीक्षा और सिफारिशों के लिए संसद की संयुक्त समिति, जेपीसी, को भेजा जाता है। सदन में यह कदम उस बहस के बीच उठता है जिसमें विपक्ष विधेयक पर कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व, सीएसआर, प्रावधानों को कमजोर करने का आरोप लगाता है, जबकि सरकार कहती है कि बदलाव केवल शुद्ध लाभ की गणना के मानदंडों तक सीमित हैं।
हाइलाइट्स
- लोकसभा ने कॉरपोरेट संशोधन विधेयक 2026 को दो साल की समीक्षा के बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने को ध्वनिमत से मंजूरी दी।
- विधेयक में कंपनियों व एलएलपी के छोटे प्रक्रियागत अपराधों के लिए दंड प्रक्रिया सरलीकरण, मुकदमेबाजी घटाने व मौद्रिक दंड का प्रस्ताव शामिल है।
- विधेयक स्टार्टअप, छोटी कंपनियों और वन पर्सन कंपनियों के लिए अनुपालन आसान बनाकर कारोबारी लागत व समय कम करने की संभावना लाता है।
विधेयक की समीक्षा और संसदीय प्रक्रिया
वित्त मंत्री ने सदन में कहा कि यह विधेयक दो वर्षों के विचार-विमर्श के बाद लाया जाता है और इसका उद्देश्य कॉरपोरेट कानून ढांचे में पहचानी गई कमियों को दूर करना है। उनके सुझाव पर स्पीकर ओम बिरला प्रस्ताव को मत के लिए रखते हैं और सदन इसे ध्वनिमत से मंजूरी देता है। जेपीसी के सदस्यों का चयन बाद में किया जाता है, जबकि विपक्ष का एक हिस्सा इसे नई संयुक्त समिति के बजाय स्थायी समिति को भेजने की वकालत करता है।
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी, तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय और डीएमके की टी सुमति विधेयक का विरोध करते हुए आरोप लगाते हैं कि इससे कंपनियों पर मुनाफे का 2 प्रतिशत सीएसआर पर खर्च करने वाली अनिवार्यता कमजोर हो सकती है। सीतारमण इन आशंकाओं को निराधार बताती हैं और कहती हैं कि पूरा सीएसआर प्रावधान नहीं, केवल शुद्ध लाभ के मानदंड में संशोधन प्रस्तावित है। गृह मंत्री अमित शाह भी हस्तक्षेप करते हुए कहते हैं कि जब सरकार खुद विधेयक को समिति के पास भेजने का प्रस्ताव रखती है, तब विपक्ष पैनल के प्रकार पर आपत्ति जता रहा है।
अनुपालन बोझ घटाने और कारोबार सुगमता पर जोर
कॉरपोरेट लॉज, संशोधन विधेयक 2026 का लक्ष्य लिमिटेड लाइबिलिटी पार्टनरशिप अधिनियम 2008 और कंपनी कानून में बदलाव कर कारोबार सुगमता को बढ़ाना है। सरकार के अनुसार, यह प्रस्ताव कंपनी लॉ कमेटी की 2022 रिपोर्ट में चिन्हित अंतरालों को संबोधित करता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल पहले ही इस विधेयक को मंजूरी दे चुका है।
प्रस्तावित संशोधनों में दंड के ढांचे का युक्तिकरण, कई छोटे प्रक्रियागत उल्लंघनों को आपराधिक दायित्व से हटाकर मौद्रिक दंड के दायरे में लाना और नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाना शामिल है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों से मुकदमेबाजी घटाने, अनुपालन ढांचे को अधिक सक्षम बनाने और कंपनियों तथा एलएलपी के लिए अधिक सहायक नियामकीय माहौल तैयार करने में मदद मिलती है। यह पहल सरकार के छोटे कॉरपोरेट अपराधों के अपराधीकरण को कम करने के व्यापक एजेंडे के अनुरूप रखी जाती है।
स्टार्टअप, छोटी कंपनियों और उद्योग पर संभावित असर
विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के बयान में कहा जाता है कि इसका लाभ वन पर्सन कंपनियों, छोटी कंपनियों, स्टार्टअप और उत्पादक कंपनियों को अनुपालन में आसानी के रूप में मिल सकता है। सरकार का तर्क है कि तेजी से बदलते कारोबारी परिदृश्य में नए कॉरपोरेट ढांचों और व्यावसायिक प्रथाओं को मान्यता देने के लिए नियामकीय व्यवस्था को अद्यतन करना जरूरी है। इससे कॉरपोरेट क्षेत्र में प्रक्रियागत लागत और समय दोनों कम हो सकते हैं।
सीएसआर को लेकर संसद में उठा विवाद यह संकेत देता है कि विधेयक की आगे की जांच में लाभ गणना, अनुपालन दायित्व और सामाजिक दायित्व के बीच संतुलन प्रमुख मुद्दा बना रहता है। जेपीसी की समीक्षा अब उद्योग, निवेशकों और नीति समुदाय के लिए महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि उसके सुझाव अंतिम कानूनी ढांचे की दिशा तय कर सकते हैं। इस प्रक्रिया का असर भारत के व्यापक ईज ऑफ डूइंग बिजनेस एजेंडे और कॉरपोरेट प्रशासन व्यवस्था पर पड़ता है।
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