भाजपा को एफवाई25 में राष्ट्रीय दलों के संयुक्त चंदे से कहीं अधिक फंडिंग मिली

भाजपा को एफवाई25 में राष्ट्रीय दलों के संयुक्त चंदे से कहीं अधिक फंडिंग मिली
भाजपा को सर्वाधिक चंदा

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, एडीआर, की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड योजना रद्द किए जाने के बाद पहले पूर्ण वित्तीय वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय दलों ने 11,343 दानों से 6,648.56 करोड़ रुपये घोषित किए हैं। रिपोर्ट बताती है कि घोषित राजनीतिक चंदे में सालाना 161% की वृद्धि होती है, जबकि भाजपा को 6,074 करोड़ रुपये मिलते हैं और वह अन्य प्रमुख राष्ट्रीय दलों के संयुक्त कुल से बहुत आगे रहती है। यह डेटा चुनाव आयोग को 20,000 रुपये या उससे अधिक के दानों के खुलासों पर आधारित है, जिससे चुनावी वित्तपोषण के नए ढांचे की स्पष्ट तस्वीर मिलती है।

हाइलाइट्स

  • 2024-25 में भाजपा को 6,074 करोड़ रुपये चंदा मिला, जो कांग्रेस समेत अन्य चार राष्ट्रीय दलों के कुल चंदे से लगभग दस गुना है।
  • प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 2024-25 में भाजपा को 2,180 करोड़ रुपये दिए, जो पार्टी की कुल घोषित फंडिंग का लगभग 36% है।
  • इलेक्टोरल बॉन्ड खत्म होने के बाद भी फंडिंग में कॉरपोरेट ट्रस्ट्स और बड़े दाताओं का दबदबा बना है, जिससे संसाधन केंद्रित रहते हैं।

एफवाई25 चंदा रुझान और दलवार ब्योरा

रिपोर्ट में भाजपा की फंडिंग सबसे बड़ा निष्कर्ष बनकर उभरती है। पार्टी को 2024-25 में 6,074 करोड़ रुपये मिलते हैं, जो पिछले वर्ष के 2,243 करोड़ रुपये से 171% अधिक है। कांग्रेस 517.39 करोड़ रुपये के साथ दूसरे स्थान पर रहती है और उसके चंदे में भी 84% की बढ़ोतरी दर्ज होती है। एडीआर के अनुसार, बहुजन समाज पार्टी 20,000 रुपये से ऊपर के दानों में एक बार फिर शून्य घोषित करती है, जैसा वह लगभग दो दशकों से करती आ रही है।

उपलब्ध आंकड़े दिखाते हैं कि भाजपा का घोषित फंड चार अन्य राष्ट्रीय दलों, कांग्रेस, आप, माकपा और नेशनल पीपुल्स पार्टी, के संयुक्त कुल से करीब दस गुना तक पहुंचता है। इससे राष्ट्रीय राजनीति में संसाधनों का असंतुलन और स्पष्ट होता है। इलेक्टोरल बॉन्ड व्यवस्था समाप्त होने के बाद भी बड़े दान कुछ चुनिंदा दलों के पक्ष में केंद्रित रहते हैं।

इलेक्टोरल ट्रस्ट और प्रमुख दाताओं की भूमिका

एडीआर डेटा में प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट सबसे प्रभावशाली माध्यम के रूप में सामने आता है। देश के कॉरपोरेट राजनीतिक चंदे का लगभग 90% इसी एक ट्रस्ट के जरिए राष्ट्रीय दलों तक पहुंचता है। 2024-25 में इस ट्रस्ट ने तीन दलों को 2,413 करोड़ रुपये दिए, जिनमें भाजपा को 2,180 करोड़ रुपये, कांग्रेस को 216 करोड़ रुपये और आप को 16 करोड़ रुपये मिलते हैं। भाजपा की घोषित कुल फंडिंग का लगभग 36% अकेले इसी ट्रस्ट से आता है।

रिपोर्ट में प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट, एबी जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट और न्यू डेमोक्रेटिक इलेक्टोरल ट्रस्ट का भी उल्लेख है, जिन्होंने क्रमशः 834 करोड़ रुपये, 621 करोड़ रुपये और 155 करोड़ रुपये दिए। इन फंडों का बड़ा हिस्सा भी मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस की ओर निर्देशित होता है। ट्रस्टों के प्रमुख योगदानकर्ताओं में आर्सेलरमित्तल निप्पॉन, डीएलएफ, मारुति सुजुकी और भारती एयरटेल शामिल हैं।

राजनीतिक वित्तपोषण पर व्यापक असर

ताजा खुलासे संकेत देते हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड खत्म होने के बाद भी बड़े कॉरपोरेट और ट्रस्ट आधारित दान चुनावी फंडिंग की केंद्रीय धुरी बने रहते हैं। इससे पारदर्शिता में कुछ बढ़ोतरी दिखती है क्योंकि दानों का स्रोत और प्राप्तकर्ता अधिक स्पष्ट रूप से दर्ज होते हैं। फिर भी, फंडिंग का भारी संकेंद्रण प्रतिस्पर्धी राजनीतिक परिदृश्य और अभियान क्षमता पर असर डालता है।

व्यक्तिगत दाताओं में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने भाजपा को 100 करोड़ रुपये और रुंगटा सन्स प्राइवेट लिमिटेड ने 95 करोड़ रुपये दिए। ऐसे बड़े एकमुश्त दान यह दिखाते हैं कि संस्थागत और उच्च मूल्य के योगदान अब भी राष्ट्रीय दलों की आय संरचना में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। आने वाले चुनावी चक्रों में यह पैटर्न नीति, प्रचार और संगठनात्मक बढ़त पर असर डाल सकता है।

हमने पहले वित्त विधेयक 2026 पर लोकसभा में हुई चर्चा और इसके तहत भरोसा-आधारित कर प्रशासन, अनुपालन बोझ में कमी तथा टीसीएस/सीमा शुल्क से जुड़ी राहतों पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में सरकार के राजकोषीय संकेतकों, सेस संग्रह बनाम राज्यों को हस्तांतरण और निवेश माहौल सुधारने के तर्कों का भी उल्लेख था।

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