आरबीआई की दिसंबर 2025 में प्रकाशित 'स्टेट फाइनेंसेज: ए स्टडी ऑफ बजेट्स 2024-25' रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में असम FY20 से FY25 के बीच वास्तविक जीएसडीपी वृद्धि में सबसे आगे है। यह तुलना ऐसे समय में सामने आती है जब अप्रैल में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में मतदान होना है, और चुनावी बहस कल्याण, पहचान की राजनीति तथा विकास के दावों पर केंद्रित रहने की संभावना है। रिपोर्ट के मुताबिक असम की अर्थव्यवस्था 2.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 3.5 लाख करोड़ रुपये हो गई, जिससे राज्य को अभियान के दौरान विकास आधारित संदेश को मजबूत करने का आधार मिलता है।
हाइलाइट्स
- FY20 से FY25 के बीच असम ने 45% वास्तविक जीएसडीपी वृद्धि दर्ज की, जो 29% के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।
- तमिलनाडु ने इसी अवधि में 39% जीएसडीपी वृद्धि दर्ज कर अपनी अर्थव्यवस्था को 12.4 लाख करोड़ रुपये से 17.3 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया।
- उच्च आर्थिक वृद्धि और बड़े मतदाता आधार के चलते असम और तमिलनाडु में निवेश, औद्योगिक क्षमता और नीति प्राथमिकताएं चुनावी विमर्श का केंद्र बनीं।
आरबीआई रिपोर्ट में वृद्धि के आंकड़े
रिपोर्ट में कहा गया है कि FY20 से FY25 के बीच असम ने 45% की वास्तविक जीएसडीपी वृद्धि दर्ज की, जो प्रमुख राज्यों में सबसे अधिक है और 29% के राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। पाठ में इस वृद्धि का आधार कृषि, तेल और गैस से राजस्व, तथा पूर्वोत्तर में लगातार बुनियादी ढांचा विस्तार को बताया गया है। लंबे समय तक उग्रवाद, बाढ़ और कमजोर आर्थिक प्रदर्शन से जोड़ी जाने वाली राज्य की छवि के बीच यह बदलाव चुनावी विमर्श में एक महत्वपूर्ण आर्थिक दावे के रूप में उभरता है।
तमिलनाडु इस सूची में असम के बाद आता है, जहां इसी अवधि में 39% वृद्धि दर्ज होती है। आरबीआई के अनुसार, राज्य की जीएसडीपी 12.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 17.3 lakh करोड़ रुपये हो जाती है। इस विस्तार को ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, वस्त्र और सेवाओं पर आधारित मजबूत विनिर्माण ढांचे से समर्थन मिलता है।
अप्रैल मतदान और राज्यों का चुनावी परिदृश्य
भारत का 2026 विधानसभा चुनाव चक्र अब औपचारिक रूप से शुरू हो चुका है, और इन राज्यों में मुकाबला राष्ट्रीय दलों तथा मजबूत क्षेत्रीय दलों की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। चुनावों में भाजपा की राष्ट्रीय उपस्थिति, कांग्रेस के पुनरुत्थान के प्रयास और दक्षिण व पूर्वी भारत में क्षेत्रीय दलों की पकड़ पर भी नजर रहती है। ऐसे में आर्थिक प्रदर्शन के आंकड़े राजनीतिक संदेश और मतदाता पहुंच रणनीति का अहम हिस्सा बनते हैं।
भारत निर्वाचन आयोग ने 15 मार्च को कार्यक्रम घोषित किया था। केरल, असम और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होता है, तमिलनाडु में 23 अप्रैल को, जबकि पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होता है। सभी पांच इकाइयों के नतीजों की गिनती 4 मई को होती है, और कुल 824 सीटों पर लगभग 17.4 करोड़ मतदाता पात्र हैं।
मतदाता आधार और व्यापक आर्थिक असर
एक प्रेस ब्रीफिंग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि मतदाता सूचियों के अनुसार तमिलनाडु में 5.67 करोड़, पश्चिम बंगाल में 6.44 करोड़, केरल में 2.70 करोड़, असम में 2.25 करोड़ और पुडुचेरी में 9.44 लाख मतदाता हैं। यह बड़ा मतदाता आधार बताता है कि विकास, रोजगार, उद्योग और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े आर्थिक दावे चुनाव प्रचार में सीधे प्रभाव डालते हैं। खासकर असम और तमिलनाडु जैसे राज्यों के लिए वृद्धि के आंकड़े निवेश, औद्योगिक क्षमता और शासन मॉडल पर राजनीतिक बहस को धार देते हैं.
व्यावसायिक नजरिये से देखें तो चुनावी राज्यों की वृद्धि दरें क्षेत्रीय निवेश आकर्षण और नीति प्राथमिकताओं का संकेत देती हैं। असम की बढ़त पूर्वोत्तर में बुनियादी ढांचा और संसाधन आधारित विस्तार की ओर ध्यान खींचती है, जबकि तमिलनाडु विनिर्माण और सेवाओं की स्थिर क्षमता को रेखांकित करता है। इससे चुनावी चर्चा केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राज्यों की विकास रणनीतियों की तुलना का मंच भी बनती है।
हमने पहले सरकारी तिमाही सर्वेक्षण के आधार पर असंगठित उद्यम क्षेत्र में अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही के दौरान श्रम ढांचे में आए बदलाव पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि वेतनभोगी (नियुक्त) श्रमिकों की हिस्सेदारी घटती है और कामकाजी मालिकों की हिस्सेदारी बढ़ती है, खासकर विनिर्माण और व्यापार में, जिससे रोजगार गुणवत्ता और आय स्थिरता पर असर की आशंका बनती है। यह पृष्ठभूमि बताती है कि आर्थिक प्रदर्शन के आंकड़े और श्रम बाजार के रुझान, दोनों ही व्यापक आर्थिक दावे और नीति-चर्चा को आकार देते हैं।
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