नई दिल्ली में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में दिए गए मुख्य भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहती हैं कि पश्चिम एशिया का बढ़ता संघर्ष अब वैश्विक ऊर्जा प्रवाह के लिए एक "सिस्टमिक ट्रेमर" बन रहा है। वह मौजूदा दशक को "स्थायी अस्थिरता" का दौर बताती हैं और तर्क देती हैं कि इसी पृष्ठभूमि में भारत की राजकोषीय स्थिति उसे अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक नीति-गत गुंजाइश देती है।
हाइलाइट्स
- वैश्विक सार्वजनिक ऋण 106 ट्रिलियन डॉलर (वैश्विक GDP का 95%) तक पहुंचा, जबकि U.S. और जापान का debt-to-GDP अनुपात क्रमशः 125% और 235% पर है।
- भारत का general government debt-to-GDP अनुपात 81% है, IMF के अनुसार 2030 तक 75.8% पर आने की संभावना, और विदेशी मुद्रा भंडार 688 अरब डॉलर (11 महीने आयात कवर) से अधिक है।
- भारत का राजकोषीय घाटा GDP का 4.4% तक लाया गया तथा सरकार 2030-31 तक debt-to-GDP अनुपात 50% पर लाने का लक्ष्य रखती है।
वैश्विक अस्थिरता और कर्ज दबाव
सीतारमण कहती हैं कि दुनिया episodic shocks के दौर से निकलकर ऐसी स्थिति में पहुंचती है जहां volatility, uncertainty, complexity और ambiguity स्थायी विशेषताएं बनती हैं। उनके अनुसार, पश्चिम एशिया का संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति की वैश्विक धमनियों को प्रभावित करने वाला व्यापक जोखिम बनता है। वह यह भी कहती हैं कि उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में लंबे समय तक चली विस्तारवादी नीतियां अब नीति-निर्माताओं की क्षमता को सीमित कर रही हैं।
वित्त मंत्री के अनुसार, वैश्विक सार्वजनिक ऋण लगभग 106 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जो वैश्विक GDP के 95 प्रतिशत से अधिक है। वह कहती हैं कि U.S. का debt-to-GDP अनुपात 125 प्रतिशत है, जबकि जापान का अनुपात 235 प्रतिशत पर खड़ा है। इस स्थिति में कई विकसित अर्थव्यवस्थाएं austerity और instability के बीच कठिन विकल्प का सामना करती हैं।
भारत की राजकोषीय स्थिति और नीति गुंजाइश
इस वैश्विक परिदृश्य के बीच सीतारमण भारत की आर्थिक स्थिति को एक अलग उदाहरण के रूप में पेश करती हैं। वह कहती हैं कि भारत के पास पूंजीगत व्यय कार्यक्रम जारी रखने, भारतीय रिजर्व बैंक के लिए दरों में कटौती की गुंजाइश बनाए रखने और प्रभावित क्षेत्रों को लक्षित सहायता देने की क्षमता है। उनके अनुसार, यह एक दशक के राजकोषीय अनुशासन का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि भारत का general government debt-to-GDP अनुपात करीब 81 प्रतिशत है और IMF का अनुमान है कि यह 2030 तक 75.8 प्रतिशत तक और घटता है। वह भारत के external debt-to-GDP अनुपात को सितंबर तक 19.1 प्रतिशत बताती हैं, जबकि 31 मार्च 2026 तक विदेशी मुद्रा भंडार 688 अरब डॉलर से अधिक है, जो लगभग 11 महीनों के आयात कवर के बराबर है।
विकास, घाटा और दीर्घकालिक लक्ष्य
सीतारमण कहती हैं कि एक दशक पहले भारत को "फ्रैजाइल फाइव" में गिना जाता था, लेकिन अब इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाता है। उनके अनुसार, राजकोषीय घाटा GDP के 4.4 प्रतिशत तक लाया गया है और सरकार 2030-31 तक debt-to-GDP अनुपात को 50 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखती है। वह जोर देती हैं कि मजबूत सार्वजनिक वित्त आर्थिक मंदी के समय राज्य की counter-cyclical क्षमता को बेहतर बनाता है।
यह संदेश ऐसे समय आता है जब ऊर्जा, भू-राजनीति और ऋण बाजारों में अस्थिरता नीति-निर्माताओं के लिए एक साथ कई जोखिम खड़े करती है। सीतारमण का तर्क है कि अपेक्षाकृत बेहतर बुनियादी सूचकांक भारत को झटकों के बीच आर्थिक प्रबंधन में अधिक लचीलापन देते हैं। इससे निवेश, सार्वजनिक व्यय और बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
हमने पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस आकलन पर रिपोर्ट किया था कि पश्चिम एशिया युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों को सहारा देने के लिए भारत के पास पर्याप्त राजकोषीय गुंजाइश है। उस रिपोर्ट में वैश्विक सार्वजनिक ऋण के दबाव, 2026 में अधिक स्थायी अस्थिरता (VUCA) के संकेत और भारत के ऋण-जीडीपी, बाह्य ऋण तथा विदेशी मुद्रा भंडार जैसे प्रमुख सूचकों के जरिए भारत की नीति-गत लचीलापन की स्थिति को भी रेखांकित किया गया था।
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