भारत के बाजारों में राहत भरी उछाल, तेल गिरावट से दर और कमाई पर फोकस
फोर्ब्स इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में दो सप्ताह के युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल व गैस प्रवाह पर रोक रोकने के ईरान के फैसले के बाद वैश्विक और भारतीय बाजारों में तेज राहत दिख रही है। हालांकि विश्लेषक इसे स्थायी तेजी की शुरुआत नहीं मान रहे हैं, क्योंकि महंगाई, वृद्धि, मानसून और भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर रहे हैं। भारतीय शेयरों, बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की चाल अब रिजर्व बैंक की नीति, मार्च तिमाही नतीजों और ऊर्जा लागत के असर के साथ पढ़ी जा रही है।
हाइलाइट्स
- युद्धविराम समझौते के बाद बुधवार को सेंसेक्स और निफ्टी करीब 4 प्रतिशत, कोस्पी 7 प्रतिशत, ब्रेंट तेल 15 प्रतिशत गिरकर 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बंद हुआ।
- भारतीय रिजर्व बैंक ने दरों को यथावत रखा, 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड नीति के बाद लगभग स्थिर रही और मौजूदा रुख तटस्थ से हल्का नरम बना।
- नुवामा और मोतिलाल ओसवाल के अनुसार, निफ्टी की मार्च तिमाही आय वृद्धि 4–6 प्रतिशत सालाना अनुमानित, लागत दबाव से मुनाफे और शेयर बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है।
युद्धविराम के बाद बाजार और तेल में तेज प्रतिक्रिया
बुधवार को सेंसेक्स और निफ्टी करीब 4 प्रतिशत उछलते हैं, जबकि एशिया के अन्य बाजारों में भी मजबूत तेजी दिखती है। दक्षिण कोरिया का कोस्पी 7 प्रतिशत चढ़ता है, हांगकांग का हैंग सेंग 3 प्रतिशत बढ़ता है और जापान का निक्केई 5 प्रतिशत से अधिक मजबूत होता है। इसी दौरान ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे फिसलता है और करीब 15 प्रतिशत गिरता है, जबकि पिछले महीने यह 119.50 डॉलर तक पहुंचा था, जो 2022 के बाद का उच्चतम स्तर था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि U.S. और ईरान दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमत हैं, और यह समझौता तेहरान के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की समयसीमा से ठीक पहले होता है। डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, समझौते की शर्तों में ईरान द्वारा तेल और गैस आपूर्ति पर अपनी नाकेबंदी रोकना शामिल है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है, इसलिए इसमें राहत का असर सीधे ऊर्जा कीमतों और जोखिम भावना पर पड़ता है।
अमित मोदीनी, सीनियर फंड मैनेजर, लीड-फिक्स्ड इनकम, श्रीराम एएमसी, का कहना है कि बाजारों को फिलहाल राहत मिली है, लेकिन बुनियादी परिदृश्य अब भी अनिश्चितता से घिरा है। उनके मुताबिक घरेलू बाजार मुख्य मैक्रो संकेतकों और आने वाले मानसून के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं। यही वजह है कि मौजूदा उछाल को कई निवेशक टिकाऊ रिकवरी के बजाय राहत रैली के रूप में देख रहे हैं।
RBI रुख, बॉन्ड यील्ड और दरों की उम्मीदें
बुधवार को भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति प्रमुख दरों को अपरिवर्तित रखती है और तटस्थ रुख बनाए रखती है। समिति पिछले नीति समीक्षा के बाद महंगाई जोखिम बढ़ने की बात नोट करती है और वृद्धि को लेकर भी चिंता जताती है। इस संयोजन से बाजार यह आकलन कर रहा है कि केंद्रीय बैंक तत्काल सख्ती की बजाय प्रतीक्षा और निगरानी की नीति अपना रहा है।
एक्सिस सिक्योरिटीज पीएमएस के मुख्य निवेश अधिकारी नवीन कुलकर्णी का कहना है कि युद्धविराम की घोषणा के बावजूद जोखिम कायम हैं, जो जीडीपी वृद्धि अनुमान पर नीचे की ओर और महंगाई अनुमान पर ऊपर की ओर दबाव डालते हैं। उनके अनुसार यदि पश्चिम एशिया में फिर से तनाव बढ़ता है और उसका असर महंगाई या वृद्धि पर पड़ता है, तो नियामक अपेक्षा से पहले दर चक्र बदल सकता है। इनवेस्को म्यूचुअल फंड के विकास गर्ग इस नीति को तटस्थ से हल्का नरम बताते हैं और कहते हैं कि इससे तत्काल दर वृद्धि की आशंकाएं कम हो सकती हैं।
कोटक महिंद्रा एएमसी के अभिषेक बिसेन का कहना है कि बाजार अगले 12 से 15 महीनों में उल्लेखनीय दर वृद्धि को पहले से कीमतों में शामिल कर रहा है। लेकिन हालिया युद्धविराम के बाद उनके मुताबिक बाजार जिन दर बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहा है, वे वास्तविक डिलीवरी से अधिक हो सकती हैं। 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूति की यील्ड नीति के बाद लगभग स्थिर रहती है, हालांकि यह पिछले दिन की तुलना में 12 आधार अंक नीचे है।
मार्च तिमाही नतीजों पर ध्यान, कमाई पर दबाव
अब घरेलू बाजारों का फोकस मार्च तिमाही के कॉरपोरेट नतीजों पर शिफ्ट होता है, जिस अवधि में व्यापार पुनर्संतुलन और पश्चिम एशिया से जुड़ी बाधाएं मौजूद रहती हैं। नुवामा रिसर्च के विश्लेषक कहते हैं कि कमाई में व्यापक सुधार अभी भी स्पष्ट नहीं है। उनके अनुसार निफ्टी की प्रति शेयर आय में सालाना 4 प्रतिशत वृद्धि की संभावना है, जिससे आम सहमति वाले अनुमानों में कटौती का जोखिम बना रहता है।
रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष पंक्ति की वृद्धि स्थिर हो सकती है, लेकिन युद्ध से जुड़ी आपूर्ति बाधाएं ऊंचे लाभांश मार्जिन पर दबाव डालती हैं। नुवामा का कहना है कि कोविड के बाद मार्जिन विस्तार का बड़ा चरण अब ऊंचे स्तर पर स्थिर हो चुका है, और आगे मुनाफे की वृद्धि अब राजस्व वृद्धि के साथ मेल खाती है या उससे थोड़ा नीचे रह सकती है। इसका अर्थ यह है कि लागत दबाव और अनिश्चित वैश्विक माहौल के बीच इक्विटी के लिए सतर्क रुख बना रहता है।
मोतिलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के विश्लेषक अभिषेक सराफ के अनुसार भारतीय बाजार ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां घरेलू सहायक कारकों के बावजूद ईरान संकट से निकले भू-राजनीतिक जोखिम भारी पड़ रहे हैं। उनका कहना है कि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है, इसलिए तेल और गैस कीमतों में उछाल का असर अर्थव्यवस्था और कंपनियों की आय दोनों पर पड़ता है। सराफ के मुताबिक निकट अवधि में बाजारों में उतार-चढ़ाव अगले कुछ हफ्तों या एक महीने तक बना रह सकता है, जबकि वह मार्च तिमाही में निफ्टी आय वृद्धि 6 प्रतिशत सालाना रहने का अनुमान रखते हैं।
हमने पहले आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक में रेपो दर यथावत रखने और नरम पड़ती महंगाई व वैश्विक जोखिमों के बीच धैर्यपूर्ण रुख बनाए रखने पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में एफवाई27 के लिए कोर महंगाई और जीडीपी वृद्धि अनुमानों के साथ यह भी बताया गया था कि पश्चिम एशिया से जुड़े जोखिम और तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव बाजार की उम्मीदों तथा नीति के आकलन को प्रभावित कर सकते हैं।
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