तमिलनाडु में परिसीमन प्रस्ताव पर राजनीतिक टकराव तेज हो रहा है, क्योंकि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन इसे राज्य के प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन पर दीर्घकालिक जोखिम के रूप में पेश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की ओर से दक्षिणी राज्यों की सीटें कम नहीं होने का आश्वासन दिए जाने के बाद भी स्टालिन कह रहे हैं कि विधेयक में कानूनी गारंटी का अभाव है।
हाइलाइट्स
- तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने 17 अप्रैल को केंद्र की परिसीमन व्यवस्था को पूरी तरह वापस लेने की मांग की और मौखिक आश्वासन से असंतोष जताया।
- डीएमके ने पिछले सप्ताह राज्यव्यापी अभियान और विरोध प्रदर्शनों के जरिये विधेयक को पहचान, राज्य अधिकार और संघीय ढांचे के बड़े मुद्दे से जोड़ दिया।
- केंद्र द्वारा दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व की सुरक्षा के दावे के बावजूद, विधेयक में स्पष्ट वैधानिक सुरक्षा के अभाव में राजनीतिक और निवेश संबंधी अनिश्चितता बनी हुई है।
विधेयक पर आपत्ति और राजनीतिक दांव
FinancialExpress.com के अनुसार, स्टालिन ने शुक्रवार, 17 अप्रैल को अपने बयान में कहा कि केंद्र की प्रस्तावित परिसीमन व्यवस्था को पूरी तरह वापस लिया जाना चाहिए और मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। उनका कहना है कि विधेयक की भाषा और उसके प्रावधान भविष्य की सरकारों को राज्यों के प्रतिनिधित्व में राजनीतिक हितों के मुताबिक बदलाव करने की गुंजाइश देते हैं।
स्टालिन ने परिसीमन आयोग को दिए जाने वाले प्रस्तावित अधिकारों पर विशेष आपत्ति जताई। उनके अनुसार, यदि विधेयक मौजूदा रूप में आगे बढ़ता है तो राज्यवार प्रतिनिधित्व को किसी भी समय बदला जा सकता है, इसलिए केवल राजनीतिक बयान भरोसेमंद सुरक्षा नहीं देते।
उन्होंने इस मुद्दे को तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास के निर्णायक मोड़ के रूप में पेश किया और इसे एक सोची-समझी राजनीतिक संरचना बताया, जिसमें राज्य के हितों के लिए खतरे की आशंका है। यह रुख एक तकनीकी संवैधानिक प्रक्रिया को व्यापक जन-राजनीतिक मुद्दे में बदलने की उनकी रणनीति को और स्पष्ट करता है।
डीएमके का अभियान और व्यापक असर
पिछले एक सप्ताह में डीएमके ने परिसीमन के प्रश्न को राज्यव्यापी राजनीतिक अभियान का रूप दिया है। स्टालिन ने केंद्र को अंतिम चेतावनी दी, पार्टी नेताओं के साथ आपात बैठकें बुलाईं, नमक्कल में काला झंडा प्रदर्शन का आह्वान किया और एक अभियान कार्यक्रम में प्रस्तावित विधेयक की प्रति भी जलाई।
इस आंदोलन की तुलना ऐतिहासिक विरोध आंदोलनों से की जा रही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी इस बहस को केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि पहचान, राज्य अधिकार और संघीय ढांचे के प्रश्न से जोड़ना चाहती है। स्टालिन ने इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा परिसीमन रोकने के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की सोच पहले भी अपनाई गई थी।
केंद्र अब भी यह रुख बनाए हुए है कि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, लेकिन तमिलनाडु सरकार का कहना है कि जब तक विधेयक में स्पष्ट वैधानिक सुरक्षा नहीं जोड़ी जाती, तब तक राजनीतिक और नीतिगत अनिश्चितता बनी रहेगी। यही अनिश्चितता इस बहस को संवैधानिक प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर निवेश, प्रशासनिक प्रभाव और राष्ट्रीय राजनीतिक संतुलन से जुड़े बड़े प्रश्न में बदल रही है।
हमारे पहले के लेख में 2026 के बाद प्रस्तावित परिसीमन को लेकर लोकसभा में उठी बहस पर चर्चा थी, जिसमें दक्षिणी और छोटे राज्यों की सीट हिस्सेदारी घटने की आशंकाओं पर केंद्र का पक्ष सामने आया था। उस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के साथ परिसीमन के तालमेल को सरकार संसद की प्रतिनिधित्व संरचना और संघीय संतुलन से जोड़कर देख रही है।
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