पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन पहले चरण के चुनावी जोखिम को बढ़ाता है

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन पहले चरण के चुनावी जोखिम को बढ़ाता है
मतदाता सूची में बड़ा बदलाव

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में पहचान और नागरिकता का सवाल रोजगार, भ्रष्टाचार और आर्थिक विकास जैसे पारंपरिक मुद्दों पर भारी पड़ रहा है। 152 सीटों वाले इस चरण में 91 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाता व्यवहार और करीबी मुकाबलों का संतुलन बदलने की आशंका बन रही है।

हाइलाइट्स

  • पश्चिम बंगाल के पहले चरण में 23 अप्रैल को 152 सीटों पर 3.60 करोड़ से अधिक मतदाता मतदान करेंगे, सुरक्षा के लिए 2,450 केंद्रीय बल कंपनी तैनात है।
  • विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत 91 लाख नाम हटने से मतदाता आधार में 12% कटौती आई, मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे ज्यादा विलोपन हुआ।
  • तृणमूल कांग्रेस ने महिलाओं के मासिक भत्ते को 1,500-1,700 रुपये और कृषि बजट को 30,000 करोड़ रुपये करने का वादा किया, भाजपा ने युवाओं/महिलाओं को 3,000 रुपये भत्ता व औद्योगिक पुनरुद्धार की घोषणा की।

पहले चरण की संरचना और मतदाता सूची विवाद

Financial Express के अनुसार, गुरुवार 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान में राज्य की 294 में से 152 सीटें शामिल हैं, जिनमें उत्तर बंगाल के आठ जिलों की सभी 54 सीटें तथा मुर्शिदाबाद, नदिया, बीरभूम और हुगली की अहम सीटें आती हैं। भारतीय निर्वाचन आयोग के मुताबिक इस चरण में 3.60 करोड़ से अधिक मतदाता, जिनमें करीब 1.75 करोड़ महिलाएं हैं, मतदान के पात्र हैं। सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की 2,450 कंपनियां तैनात हैं और 8,000 से अधिक मतदान केंद्रों को अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।

चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा विवाद विशेष गहन पुनरीक्षण, SIR, के तहत मतदाता सूची से 91 लाख से अधिक नाम हटाए जाने पर केंद्रित है। इससे कुल मतदाता आधार में लगभग 12% की कमी आई है, जबकि मुर्शिदाबाद, नदिया, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे अधिक विलोपन दर्ज हुआ है। इसी कारण स्थानीय मुद्दों की विविधता के बावजूद चुनावी विमर्श में पहचान, नागरिकता और प्रतिनिधित्व का प्रश्न सबसे ऊपर आ गया है।

पहले चरण का दांव दोनों प्रमुख दलों के लिए अलग कारणों से बड़ा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इन 152 सीटों में तृणमूल कांग्रेस ने 93 और भाजपा ने 59 सीटें जीती थीं। भाजपा के लिए उत्तर बंगाल उसका वह क्षेत्र बना हुआ है जिसने 2019 लोकसभा चुनाव में उसके उभार को गति दी, जबकि तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिकता उत्तर में भाजपा की बढ़त रोककर दक्षिण बंगाल के चरणों से पहले राजनीतिक बढ़त बनाए रखना है।

क्षेत्रीय मुकाबले, घोषणापत्र और राजनीतिक असर

क्षेत्रवार मुद्दे इस चरण को कई अलग-अलग उपचुनावी मैदानों में बदल रहे हैं। दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार में चाय बागान मजदूरी, बेरोजगारी और गोरखा प्रश्न प्रमुख हैं; कूचबिहार पट्टी में राजबंशी पहचान की राजनीति असर डाल रही है; मालदा और उत्तर दिनाजपुर के सीमावर्ती इलाकों में नागरिकता और घुसपैठ पर बहस तेज है; जबकि मुर्शिदाबाद और नदिया में अल्पसंख्यक चिंताओं के साथ मतदाता सूची से नाम हटने का मुद्दा निर्णायक बन रहा है। मालदा के मोथाबाड़ी जैसे इलाकों में विरोध प्रदर्शनों ने तनाव और बढ़ा दिया है।

कई हाई-प्रोफाइल सीटें भी इस चरण की राजनीतिक अहमियत बढ़ाती हैं। नंदीग्राम में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी अपनी प्रतीकात्मक सीट बचाने की कोशिश कर रहे हैं। बहारामपुर में अधीर रंजन चौधरी की वापसी राज्य में कांग्रेस की प्रासंगिकता की परीक्षा के रूप में देखी जा रही है, जबकि माथाभांगा में निसिथ प्रमाणिक और दिनहाटा में उदयन गुहा के मुकाबले उत्तर बंगाल में दलगत पकड़ का संकेत दे सकते हैं।

पहचान आधारित बहस के बावजूद दोनों दल आर्थिक और कल्याणकारी वादों पर भी जोर दे रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने लक्ष्मीर भंडार के तहत महिलाओं के लिए मासिक सहायता को 500-1,000 रुपये से बढ़ाकर 1,500-1,700 रुपये करने, बेरोजगार युवाओं के लिए 1,500 रुपये मासिक भत्ता, 30,000 करोड़ रुपये का कृषि बजट, सार्वभौमिक आवास और पाइप जलापूर्ति, स्वास्थ्य शिविर और स्कूल तथा व्यापारिक अवसंरचना उन्नयन का वादा किया है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में युवाओं और महिलाओं के लिए 3,000 रुपये मासिक भत्ता, सातवें वेतन आयोग का क्रियान्वयन, बकाया महंगाई भत्ता, औद्योगिक पुनरुद्धार, MSME वृद्धि, भ्रष्टाचार विरोधी उपाय और राज्य-केंद्र समन्वय वाले डबल इंजन मॉडल के जरिए तेज विकास का वादा रखा है।

हमारे पहले के लेख में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की उन निर्णायक सीटों का खाका पेश किया गया था, जहां तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला जातीय गणित, सीमा-संबंधी चिंताओं और नागरिकता बहस के साथ और तीखा हो रहा है। उसमें नंदीग्राम, भवानीपुर, दिनहाटा, रायगंज, सिलीगुड़ी और संदेशखाली जैसी सीटों पर हालिया हिंसा/तनाव, अल्पसंख्यक व क्षेत्रीय पहचान के मुद्दों और बहुकोणीय मुकाबलों के संभावित असर को रेखांकित किया गया था।

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