पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था बढ़ी, लेकिन कर्ज और रोजगार का दबाव चुनावी बहस के केंद्र में

पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था बढ़ी, लेकिन कर्ज और रोजगार का दबाव चुनावी बहस के केंद्र में
बंगाल चुनावी अर्थव्यवस्था

पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को मतदान के बीच राज्य की आर्थिक उपलब्धियां और राजकोषीय कमजोरियां एक साथ राजनीतिक बहस को आकार दे रही हैं। तृणमूल कांग्रेस सरकार कल्याण योजनाओं और जीएसडीपी वृद्धि को अपनी ताकत बता रही है, जबकि विपक्ष कर्ज, पूंजीगत व्यय और रोजगार की गुणवत्ता को मुख्य मुद्दा बना रहा है।

हाइलाइट्स

  • पश्चिम बंगाल का GSDP 2010-11 के ₹4.61 लाख करोड़ से बढ़कर 2026-27 में अनुमानित ₹21.48 लाख करोड़ हुआ, सेवा क्षेत्र और कल्याण योजनाओं के कारण।
  • राज्य पर कर्ज 1.92 लाख करोड़ रुपये (2010) से बढ़कर मार्च 2027 तक अनुमानित 8,15,891.35 करोड़ रुपये हो जाएगा; कर्ज-से-GSDP अनुपात 35-45%।
  • तृणमूल कांग्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 2.5 करोड़ नौकरियां बनीं और बेरोजगारी दर 4.14% है, परंतु रोजगार मुख्यतः अनौपचारिक MSME और ग्रामीण योजनाओं में केंद्रित।

वृद्धि, कल्याण और बजटीय प्राथमिकताएं

FinancialExpress.com के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व में पिछले 15 वर्षों में पश्चिम बंगाल का सकल राज्य घरेलू उत्पाद 2010-11 के लगभग 4.61 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 के लिए अनुमानित 21.48 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा है। इस वृद्धि को सेवा क्षेत्र की मजबूती और ग्रामीण मांग के विस्तार से सहारा मिला, जिसे लक्ष्मी भंडार और कन्याश्री जैसी कल्याण योजनाओं ने बल दिया है।

राज्य सरकार ने लक्ष्मी भंडार की राशि में 500 रुपये की बढ़ोतरी की और बेरोजगार युवाओं के लिए 1,500 रुपये मासिक भत्ता भी शुरू किया। दिसंबर 2025 में ममता बनर्जी ने कहा था कि 2013 से 2023 के बीच 1.72 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया और 2 करोड़ से अधिक लोगों को सार्थक रोजगार मिला।

फरवरी में पेश अंतरिम बजट में वित्त विभाग के लिए 46,293.09 करोड़ रुपये और पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास विभाग के लिए भी 46,293.09 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। स्वास्थ्य विभाग को 22,338 करोड़ रुपये, सामाजिक कल्याण को 42,114 करोड़ रुपये और स्कूल शिक्षा को 41,235 करोड़ रुपये दिए गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार सामाजिक क्षेत्र के खर्च को अपनी केंद्रीय नीति के रूप में बनाए हुए है।

इसी बजट ढांचे में सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी, शहरी विकास, लोक निर्माण, बिजली, सिंचाई, परिवहन और क्षेत्रीय विकास मदों के लिए भी आवंटन किया गया है। 2026-27 के लिए कुल राजस्व व्यय 3,09,551.07 करोड़ रुपये तक बढ़ने का अनुमान है, जिसमें केवल सामाजिक सेवाओं का हिस्सा 1,62,611.72 करोड़ रुपये है।

कर्ज, रोजगार और राज्य की संरचनात्मक चुनौतियां

निति आयोग के Fiscal Health Index 2026 में पश्चिम बंगाल को उन पांच राज्यों में रखा गया है जो बढ़ते कर्ज, लगातार घाटे और सीमित राजस्व वृद्धि के कारण लगातार राजकोषीय दबाव का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे राज्यों में कर्ज का स्तर जीएसडीपी के लगभग 35% से 45% तक है, ब्याज भुगतान ऊंचा है और विकास व्यय अपेक्षाकृत कम रहता है।

पश्चिम बंगाल ने पिछली वाम मोर्चा सरकार से ऊंचा कर्ज विरासत में पाया था, जब कर्ज-से-जीएसडीपी अनुपात 40% से ऊपर था और कुल राजस्व का लगभग 21% केवल पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने में जा रहा था। पिछले 15 वर्षों में अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है, लेकिन कर्ज की कुल राशि भी 1.92 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 7.26 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि राज्य वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2027 के अंत तक संचित कर्ज 8,15,891.35 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

2026-27 के बजट अनुमान 21,759.34 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे और 80,444.55 करोड़ रुपये के बाजार ऋण का भी संकेत देते हैं। पूंजीगत व्यय का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार और अन्य इकाइयों के ऋण चुकाने में जा रहा है, जो 44,606.53 करोड़ रुपये बताया गया है।

रोजगार के मोर्चे पर तृणमूल कांग्रेस ने जमीनी उद्यमिता और लगभग 2.5 करोड़ नौकरियों के सृजन का दावा किया है, जबकि राज्य की बेरोजगारी दर 4.14% बताई गई है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। फिर भी बहस इस बात पर केंद्रित है कि रोजगार का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक MSME क्षेत्र या ग्रामीण कार्य योजनाओं में केंद्रित है, जिससे विनिर्माण, उत्पादक निवेश और टिकाऊ आय वृद्धि पर सवाल बने हुए हैं।

हमारी पिछली रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले उम्मीदवारों की शपथपत्र-आधारित वित्तीय प्रोफाइल में सामने आई बड़ी देनदारियों पर चर्चा की गई थी। ADR के विश्लेषण के अनुसार कई उम्मीदवारों पर करोड़ों रुपये की देनदारियां दर्ज थीं और कुछ मामलों में देनदारियां घोषित संपत्तियों से भी अधिक पाई गईं, जिससे कोलकाता व आसपास के क्षेत्रों में वित्तीय जोखिम और पारदर्शिता पर फोकस बढ़ा।

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