पश्चिम बंगाल में भाजपा बढ़त, तृणमूल के गढ़ में रिकॉर्ड मतदान के बीच बड़ा राजनीतिक उलटफेर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना राज्य की सत्ता संरचना में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है, जहां 15 साल से प्रभावी तृणमूल कांग्रेस अपने पारंपरिक गढ़ों में पिछड़ती दिख रही है। ऊंचे मतदान प्रतिशत, महिला और अल्पसंख्यक वोटों में बदलाव, तथा रोजगार और भर्ती घोटाले जैसे मुद्दे इस बदलाव के प्रमुख कारकों के रूप में उभर रहे हैं।
हाइलाइट्स
- पश्चिम बंगाल में भाजपा 194 सीटों पर आगे, तृणमूल कांग्रेस 92 पर सिमटी, जबकि बहुमत के लिए 148 सीटें जरूरी हैं।
- राज्य में मतदान प्रतिशत 92.49% रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा, हिंसा और पुनर्मतदान के बावजूद मतदाताओं में व्यापक असंतोष दिखा।
- महिला, अल्पसंख्यक और युवा मतदाता समूहों में समर्थन घटने से तृणमूल की पारंपरिक पकड़ कमजोर पड़ी, खासतौर पर मुर्शिदाबाद-मालदा क्षेत्रों में।
मतगणना के रुझान और चुनावी आंकड़ों का संकेत
Financial Express के अनुसार, भारतीय निर्वाचन आयोग के ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि पश्चिम Bengal में भाजपा 194 सीटों पर आगे है, जो 148 के बहुमत के आंकड़े से काफी ऊपर है, जबकि तृणमूल कांग्रेस 92 सीटों तक सिमटती दिख रही है। यह गिरावट 2021 में पार्टी की 215 सीटों की जीत की तुलना में बेहद तीखी मानी जा रही है।
मतदान प्रतिशत 92.49% तक पहुंचा है, जिसे राज्य के स्वतंत्रता के बाद के सबसे ऊंचे मतदान स्तरों में गिना जा रहा है। फाल्टा सीट पर हिंसा और भारतीय निर्वाचन आयोग की पुनर्मतदान की कार्रवाई के बावजूद यह भागीदारी बनी रही, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि मतदाताओं ने इस बार असंतोष को व्यापक रूप से दर्ज कराया है।
रुझान यह भी दिखाते हैं कि यह केवल सीमित नुकसान नहीं, बल्कि तृणमूल के पारंपरिक प्रभाव क्षेत्रों में व्यापक क्षरण है। भले ही ममता बनर्जी भवानीपुर में निर्णायक बढ़त या जीत की स्थिति में हों, राज्यस्तर पर तस्वीर पार्टी के लिए कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण बन रही है।
महिला, अल्पसंख्यक और युवा मतदाताओं में बदलाव
विश्लेषण में उन सामाजिक और राजनीतिक आधारों के कमजोर पड़ने की बात कही गई है, जिन पर ममता बनर्जी की चुनावी बढ़त लंबे समय तक टिकी रही। महिला मतदाताओं को तृणमूल का सबसे भरोसेमंद आधार माना जाता रहा है, लेकिन आरजी कर मेडिकल कॉलेज त्रासदी और संदेशखाली से जुड़े आरोपों ने इस समर्थन में दरार डाली है।आरजी कर मामले पर ममता बनर्जी की टिप्पणियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार की कथित विफलता ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया। आरजी कर पीड़िता की मां का बदलाव लाने के मुद्दे पर भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना भी तृणमूल के लिए राजनीतिक रूप से प्रतिकूल माना गया है।
अल्पसंख्यक वोटों में बंटवारे ने भी तृणमूल की स्थिति कमजोर की है। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के आधार पर यह असर खासकर मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में ज्यादा महत्वपूर्ण बताया गया है, जहां तृणमूल को पहले मजबूत माना जाता था। हुमायूं कबीर के नेतृत्व वाली आम जनता उन्नयन पार्टी और पुनर्जीवित वाम-कांग्रेस गठबंधन ने मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में अल्पसंख्यक वोटों का उल्लेखनीय हिस्सा अपने पक्ष में खींचा।
युवा और प्रवासी मतदाताओं के बीच भी असंतोष एक प्रमुख तत्व बनकर सामने आया है। औद्योगिक वृद्धि की कमी, बढ़ती बेरोजगारी और शिक्षक भर्ती घोटाले ने रोजगार को केंद्रीय चुनावी मुद्दा बना दिया, जबकि बुनियादी ढांचा विकास के वादों ने कल्याणकारी योजनाओं के मुकाबले अधिक असर डाला। इन रुझानों के बीच तृणमूल अब ऐसे दौर में प्रवेश करती दिख रही है, जहां उसे अपनी राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक आधार दोनों को नए सिरे से गढ़ना पड़ सकता है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना के बीच भाजपा के बहुमत के आंकड़े (148 सीटें) से आगे निकलने और तृणमूल कांग्रेस के पीछे रहने के रुझानों पर चर्चा की गई थी। इसमें पनिहाटी सीट पर आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले की पीड़िता की मां और भाजपा उम्मीदवार रत्ना देबनाथ की बढ़त को महिला सुरक्षा व न्याय जैसे मुद्दों से जुड़े भावनात्मक समर्थन के संकेत के रूप में भी देखा गया था।
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