भारत में निजी निवेश की सुस्ती पर कांग्रेस ने कॉरपोरेट मुनाफे के बावजूद मांग और अनिश्चितता का मुद्दा उठाया

भारत में निजी निवेश की सुस्ती पर कांग्रेस ने कॉरपोरेट मुनाफे के बावजूद मांग और अनिश्चितता का मुद्दा उठाया
निजी निवेश में सुस्ती

कोविड के बाद बड़ी भारतीय कंपनियों के मुनाफे में तेज बढ़ोतरी के बीच निजी कॉरपोरेट निवेश की सुस्ती फिर से आर्थिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश का कहना है कि कर कटौती और निवेशक समर्थक दावों के बावजूद निवेश नहीं बढ़ रहा, जिससे उच्च वास्तविक जीडीपी वृद्धि हासिल करने में बाधा बन रही है।

हाइलाइट्स

  • Indian Express रिपोर्ट के अनुसार कोविड के बाद भारत की शीर्ष 500 कंपनियों के मुनाफे 30.8% की वार्षिक दर से बढ़े, जबकि पूंजीगत व्यय और नए निवेश अपेक्षाकृत कमजोर रहे।
  • मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने निजी क्षेत्र से निवेश में हिचकिचाहट और मांग संबंधी अनिश्चितता पर आत्मविश्लेषण करने को कहा।
  • कांग्रेस ने कमजोर उपभोक्ता मांग, स्थिर वास्तविक मजदूरी और प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई को निजी निवेश में सुस्ती के प्रमुख कारण बताए।

मुनाफे और पूंजीगत खर्च के बीच अंतर

Financial Express की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए जयराम रमेश ने कहा कि भारत की शीर्ष 500 कंपनियों के मुनाफे कोविड के बाद 30.8% की वार्षिक दर से बढ़े हैं, लेकिन पूंजीगत व्यय और नए निवेश अपेक्षाकृत कमजोर बने हुए हैं। उन्होंने इसे उस मुद्दे की पुष्टि बताया जिसे कांग्रेस लंबे समय से उठाती रही है कि कॉरपोरेट कर दरों में कटौती और कारोबारी सुगमता के दावों के बावजूद निजी निवेश में अपेक्षित तेजी नहीं आई है।

रमेश ने मंगलवार को X पर कहा कि निजी कॉरपोरेट निवेश की सुस्ती अर्थव्यवस्था को ऊंची वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर तक पहुंचने से रोकने वाली एक बुनियादी समस्या है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की नीतियों का घोषित उद्देश्य निवेश बढ़ाना था, लेकिन उसका इच्छित परिणाम सामने नहीं आया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने निजी क्षेत्र से यह सोचने को कहा कि वह निवेश करने में हिचकिचा क्यों रहा है, और क्या यही रुख मांग संबंधी अनिश्चितता को बढ़ा रहा है।

मांग, नीति और कारोबारी माहौल पर सवाल

रमेश ने निजी निवेश में इस कथित अनिच्छा के पीछे कई कारण गिनाए। उनके अनुसार, वास्तविक मजदूरी में ठहराव और कमजोर उपभोक्ता मांग के कारण कंपनियों को नई क्षमता में निवेश का पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रवर्तन एजेंसियों की आक्रामक कार्रवाई से कारोबारी अनिश्चितता और निवेशक समुदाय में भय का माहौल बना है। इसके अलावा, उनका कहना है कि निवेश-प्रधान क्षेत्रों में चुनिंदा समूहों का प्रभुत्व बढ़ने और राजनीतिक चंदे के बदले कारोबारी लाभ की कथित संस्कृति ने स्वतंत्र निजी निवेश की प्रेरणा को कमजोर किया है।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत की कोविड के बाद की आर्थिक बहाली में घरेलू मांग की कमजोरी और बड़े कॉरपोरेट समूहों तक लाभ के सीमित रहने को लेकर बहस तेज है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के 2026 विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कॉरपोरेट नेताओं की शुरुआती प्रतिक्रियाओं और निवेश, रोजगार व नीतिगत स्थिरता को लेकर बनी उम्मीदों पर चर्चा की गई थी। इसमें Harsh Goenka, Sanjiv Goenka और Zoho के Sridhar Vembu के बयानों के जरिए बताया गया था कि राजनीतिक संकेतों को कई उद्योग प्रतिनिधि पूंजी प्रवाह और विकास एजेंडा के संभावित उत्प्रेरक के रूप में देख रहे हैं।

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