पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो-तिहाई जीत, मतदाता सूची संशोधन के रुझान ने क्षेत्रीय असर दिखाया
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा 294 सदस्यीय सदन में 206 सीटें जीतकर निर्णायक बढ़त हासिल करती है, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट जाती है। नतीजों के साथ विशेष गहन पुनरीक्षण, SIR, के बाद मतदाता संख्या में हुए बदलाव राजनीतिक बहस के केंद्र में बने हुए हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में अलग असर दिखाते हैं।
हाइलाइट्स
- मतदाता वृद्धि वाली 14 सीटों में भाजपा ने 12 जीतकर पूर्व मेदिनीपुर और जंगमहल-बांकुरा के ग्रामीण इलाकों में क्षेत्रीय बढ़त बनाई।
- मतदाता सूची संशोधन के तहत लगभग 91 लाख नाम हटाए गए, जिनमें 63 लाख अनुपस्थित, मृत, डुप्लिकेट व 27 लाख तार्किक विसंगतियों में गिने गए।
- जहां मतदाता सूची में बड़ी कटौती हुई, वहां तृणमूल कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा, जबकि भाजपा को वृद्धि वाले क्षेत्रों में स्पष्ट लाभ मिला।
मतदाता सूची बदलाव और सीटवार रुझान
Jansatta की विशेष शृंखला ‘आंकड़े बोलते हैं’ के अनुसार, 294 विधानसभा क्षेत्रों के संकलित आंकड़े SIR प्रक्रिया से पहले और बाद की मतदाता संख्या, विजेता दल और जीत के अंतर को साथ रखकर नतीजों की परतें दिखाते हैं। इस विश्लेषण में शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं की कमी, ग्रामीण सीटों में बढ़ोतरी, कोलकाता और आसपास के इलाकों में तेज गिरावट, और मुर्शिदाबाद-मालदा पट्टी की कई सीटों पर 25 प्रतिशत तक कमी जैसे पैटर्न सामने आते हैं।आंकड़ों में 14 ऐसी सीटें भी चिन्हित की गई हैं जहां SIR के बाद सबसे अधिक नाम हटाए गए। इन सीटों पर नतीजे बराबरी पर बंटे दिखते हैं, सात सीटें भाजपा जीतती है और सात तृणमूल कांग्रेस के खाते में जाती हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि केवल नाम कटने का असर पूरे राज्य में एकतरफा नहीं पड़ता।
इसके विपरीत, 14 ऐसी सीटों पर जहां मतदाता संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज होती है, भाजपा 12 सीटें जीतती है जबकि तृणमूल कांग्रेस केवल एक सीट लेती है। खेजुरी, नंदकुमार, ओंडा, तमलुक और कोतुलपुर जैसी सीटों पर जीत का अंतर भी ऊंचा रहता है, और पूर्व मेदिनीपुर तथा जंगमहल-बांकुरा पट्टी में मतदाता वृद्धि के साथ भाजपा की मजबूत बढ़त एक भौगोलिक पैटर्न बनाती है।
राजनीतिक विवाद और चुनावी असर
SIR प्रक्रिया पूरे चुनाव के दौरान राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा बनी रहती है। मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटाए जाते हैं, जिनमें लगभग 63 लाख मामलों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट श्रेणी में रखा जाता है, जबकि करीब 27 लाख मामलों में चुनाव आयोग तार्किक विसंगतियों का हवाला देता है।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस पुनरीक्षण का विरोध करती हैं और आरोप लगाती हैं कि यह उनकी पार्टी के मूल मतदाता आधार को निशाना बनाने वाला कदम है, जिसे NRC जैसे बड़े मुद्दों से भी जोड़ा जाता है। चुनाव आयोग अपनी ओर से कहता है कि प्रक्रिया स्थापित मानकों के अनुसार चलती है।
उपलब्ध आंकड़े यह संकेत देते हैं कि मतदाता सूची में बदलाव का असर पूरे राज्य में समान नहीं है। जहां कुछ इलाकों में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिलती है, वहीं मतदाता संख्या घटने वाले कई क्षेत्रों में तृणमूल कांग्रेस अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती है, जिससे चुनावी परिणामों पर स्थानीय सामाजिक और भौगोलिक कारकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में SIR के तहत मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटने के शुरुआती रुझानों और उसके जिला-वार असर पर हमने पहले रिपोर्ट किया था। उस लेख में मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे संवेदनशील इलाकों में विलोपन के पैटर्न, तथा नदिया-उत्तर 24 परगना के मतुआ प्रभाव वाले क्षेत्रों और सीमावर्ती सीटों पर बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों का चुनावी संकेतकों से संबंध बताया गया था।
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