भारत के श्रम बाजार में ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ी, शहरी दर में नरमी
भारत के श्रम बाजार के ताजा रुझान ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अलग-अलग दिशा दिखाते हैं। नवीनतम PLFS आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण बेरोजगारी दर में हल्की बढ़ोतरी होती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी में कुछ नरमी आती है और महिलाओं की बेरोजगारी बढ़ती है।
हाइलाइट्स
- PLFS के ताजा आंकड़ों में ग्रामीण बेरोजगारी दर में वृद्धि और शहरी बेरोजगारी दर में गिरावट दर्ज हुई।
- ग्रामीण कामगारों का नियमित वेतन वाले रोजगार की ओर झुकाव बढ़ा लेकिन सभी वर्गों खासतौर पर महिलाओं को समान लाभ नहीं मिला।
- महिलाओं की बेरोजगारी दर में इजाफा श्रम भागीदारी और रोजगार के असंतुलन को दर्शाता है, जिससे ग्रामीण मांग और आय पर असर पड़ेगा।
PLFS आंकड़ों में रोजगार रुझान
Forbes India की रिपोर्ट के अनुसार, पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे, PLFS, के ताजा आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर बढ़ती है, जबकि शहरी इलाकों में नौकरीहीनता कम होती है। इसी अवधि में अधिक ग्रामीण कामगार नियमित वेतन वाले रोजगार की ओर बढ़ते हैं, लेकिन महिलाओं की बेरोजगारी दर में वृद्धि दर्ज होती है।
यह रुझान संकेत देता है कि श्रम बाजार में रोजगार के अवसरों की प्रकृति बदल रही है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में काम की उपलब्धता और रोजगार की गुणवत्ता के बीच अंतर बना रहता है, क्योंकि नियमित वेतन वाले काम की ओर झुकाव बढ़ने के बावजूद सभी वर्गों को समान लाभ नहीं मिलता।
महिला रोजगार और व्यापक आर्थिक असर
महिलाओं की बेरोजगारी में बढ़ोतरी इस बात की ओर इशारा करती है कि श्रम भागीदारी और रोजगार सृजन के बीच असंतुलन बना हुआ है। शहरी बेरोजगारी में नरमी कुछ राहत देती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बेरोजगारी बताती है कि क्षेत्रीय रोजगार स्थितियां अभी भी असमान हैं।यह आंकड़ा नीति निर्माताओं और कारोबारों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ग्रामीण मांग, आय स्तर और उपभोग पर रोजगार के रुझानों का सीधा असर पड़ता है। नियमित वेतन वाले रोजगार की ओर बढ़ता झुकाव लंबी अवधि में आय स्थिरता को सहारा दे सकता है, लेकिन महिला रोजगार में कमजोरी श्रम बाजार की समावेशिता पर सवाल खड़े करती है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा चार श्रम संहिताओं को लागू किए जाने के बाद श्रम सुधारों को लेकर बढ़े राजनीतिक टकराव और इनके संभावित असर पर चर्चा की गई थी। इसमें वेज कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों के जरिए वेतन संरचना, नौकरी सुरक्षा, यूनियन अधिकार और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित किया गया था।
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