भारत के श्रम संहिताओं पर राजनीतिक विवाद गहराया, कांग्रेस ने श्रमिक अधिकारों पर असर का मुद्दा उठाया

भारत के श्रम संहिताओं पर राजनीतिक विवाद गहराया, कांग्रेस ने श्रमिक अधिकारों पर असर का मुद्दा उठाया
श्रम सुधारों पर राजनीति

केंद्र सरकार की चार श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद भारत में श्रम सुधारों को लेकर राजनीतिक टकराव तेज हो रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इन्हें श्रमिक-विरोधी और कॉरपोरेट-केंद्रित बताते हुए कहा कि इनका असर नौकरी सुरक्षा, वेतन संरचना, यूनियन अधिकार और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ता है।

हाइलाइट्स

  • केंद्र सरकार ने विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद चार प्रमुख श्रम संहिताओं को अधिसूचित किया, जिससे श्रमिक अधिकारों पर असर को लेकर कांग्रेस ने चिंता जताई।
  • नए वेज कोड में कुल वेतन का 50% मूल वेतन रखने की अनिवार्यता से टेक-होम सैलरी घटने व MSME पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
  • इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड के तहत 300 कर्मचारियों तक की कंपनियों को छंटनी में सरकारी मंजूरी से छूट और हड़ताल पर 60 दिन की नोटिस से नौकरी सुरक्षा कमजोर हो सकती है।

श्रम संहिताओं के प्रावधानों पर कांग्रेस का हमला

Financial Express के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोमवार को केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि नई श्रम संहिताएं बिना पर्याप्त परामर्श के लागू की गईं और ये श्रमिकों के अधिकारों के लिए बड़ा झटका हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने विधानसभा चुनाव खत्म होने के तुरंत बाद चारों श्रम संहिताओं को अधिसूचित किया और इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के औद्योगिक समर्थकों को लाभ मिलेगा।

खड़गे ने X पर लिखे संदेश में कहा कि करोड़ों श्रमिकों के लिए ये संहिताएं हायर-एंड-फायर नीति, ठेका रोजगार और यूनियन बनाने की सीमित गुंजाइश का भविष्य पेश करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय श्रम सम्मेलन 2015 के बाद से नहीं बुलाया गया, जिससे परामर्श प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।

केंद्र सरकार ने पांच साल से अधिक की प्रक्रिया के बाद चार श्रम संहिताओं को पूरी तरह परिचालन में लाया है। इनमें वेज कोड 2019, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड 2020, सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020 शामिल हैं, जिनका उद्देश्य 29 श्रम कानूनों को एक सरल ढांचे में समेटना है।

वेतन, सुरक्षा और उद्योग पर संभावित प्रभाव

खड़गे ने वेज कोड की आलोचना करते हुए कहा कि इससे कॉरपोरेट-केंद्रित वेतन ढांचा बनता है, न्यूनतम वेतन कम हो सकता है और कृषि श्रमिकों तथा घरेलू कामगारों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। उनका कहना है कि मूल वेतन को कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50% रखने की शर्त से टेक-होम सैलरी में तेज कमी आ सकती है, जबकि इससे MSME क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि न्यूनतम वेतन तय करने के पहले इस्तेमाल होने वाले मानकों, जैसे कैलोरी जरूरत, कपड़े, किराया और ईंधन लागत, को हटाकर केंद्र सरकार के आदेश पर निर्भर व्यवस्था बनाई गई है। उनके मुताबिक इससे वेतन निर्धारण अधिक विवेकाधीन हो जाता है और श्रमिकों के हित प्रभावित हो सकते हैं।

कार्यस्थल सुरक्षा को लेकर खड़गे ने ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महिला कर्मचारियों की नाइट शिफ्ट सुरक्षा, परिवहन, एस्कॉर्ट, CCTV और ठेका श्रमिकों के स्वास्थ्य संबंधी दायित्वों पर कोई ठोस अनिवार्य ढांचा स्पष्ट नहीं है, जबकि कुछ सुरक्षा उल्लंघनों के निपटारे में आपराधिक कार्रवाई के बजाय धनराशि भुगतान की गुंजाइश दी गई है।

सोशल सिक्योरिटी कोड और इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड को लेकर भी कांग्रेस ने आपत्ति जताई है। खड़गे का कहना है कि गिग वर्कर्स के लिए फंडिंग, योगदान और बीमा का स्पष्ट मॉडल नहीं है, जबकि 300 कर्मचारियों तक की कंपनियों को छंटनी के लिए सरकारी अनुमति से छूट मिलने और हड़ताल से पहले 60 दिन की नोटिस शर्त से नौकरी सुरक्षा तथा सामूहिक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होती है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में पश्चिम एशिया संकट के बीच केंद्र सरकार द्वारा ECLGS 5.0 के तहत MSME, एयरलाइंस और अन्य प्रभावित कंपनियों के लिए 18,100 करोड़ रुपये की ऋण-गारंटी सहायता को मंजूरी दिए जाने पर चर्चा की गई थी। इसमें बताया गया था कि यह योजना सरकारी गारंटी के जरिए अतिरिक्त कर्ज प्रवाह खोलकर बढ़ी ईंधन/लॉजिस्टिक्स लागत और आपूर्ति शृंखला बाधाओं के दबाव को कम करने तथा कारोबार संचालन और रोजगार निरंतरता को सहारा देने के लिए लाई गई है।

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