भारत RCEP में शामिल होने से इनकार बरकरार रखता है, सरकार ने विनिर्माण और व्यापार घाटे के जोखिम गिनाए
मुंबई में आयोजित एक बैंकिंग कार्यक्रम में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत के RCEP से बाहर रहने के रुख को फिर दोहराया और कहा कि सरकार के पास इस व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की कोई योजना नहीं है। उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब एशिया-प्रशांत के 15 देशों वाला यह समूह 2022 से लागू है और भारत में इसके संभावित आर्थिक असर पर बहस जारी है।
हाइलाइट्स
- भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि RCEP में शामिल होने की 2026 तक कोई संभावना नहीं है, घरेलू उद्योग और व्यापार घाटे के जोखिम गिनाते हुए।
- मंत्री गोयल के अनुसार, देशभर में 200 हितधारक परामर्श में से केवल तीन ने RCEP में शामिल होने का समर्थन किया, जिसके बाद नवंबर 2019 में वार्ता से हटने का निर्णय लिया गया।
- चीन को लेकर सतर्कता बरकरार रखते हुए भारत ने 2020 की Press Note 3 के माध्यम से सीमावर्ती देशों से निवेश पर नियंत्रण बनाए रखा, जबकि 2026 की Press Note 2 से स्वामित्व संबंधी कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई।
सरकार का रुख और समझौते पर आपत्तियां
जैसा कि Financial Express ने बताया, गोयल ने Financial Express Best Banks Awards 2026 में कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान RCEP के होने की "बिलकुल कोई संभावना" नहीं है। उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस नीत सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि भारत को इस वार्ता में ले जाना एक गलत कदम था और समझौते के मूल सिद्धांत भारत के हित में नहीं थे।RCEP, एशिया-प्रशांत क्षेत्र का एक बड़ा मुक्त व्यापार समझौता है, जिसमें 10 ASEAN देश, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल हैं। भारत कई वर्षों तक वार्ता का हिस्सा रहा, लेकिन 2019 में व्यापार असंतुलन, आयात दबाव और घरेलू उद्योग की सुरक्षा को लेकर चिंताओं के कारण इससे अलग हो गया।
गोयल ने कहा कि इस समझौते से भारतीय विनिर्माण को गंभीर नुकसान हो सकता था। उनके अनुसार सबसे बड़ी चिंता चीन से आयात में तेज बढ़ोतरी की थी, क्योंकि भारत पहले से ही चीन के साथ बड़े व्यापार घाटे का सामना करता है और सस्ती चीनी वस्तुएं भारतीय बाजार में आकर घरेलू निर्माताओं, MSME और किसानों पर दबाव बढ़ा सकती थीं।
मंत्री ने यह भी कहा कि 15 सदस्य देशों में से 10 के साथ भारत के पहले से मुक्त व्यापार समझौते थे, जबकि ऑस्ट्रेलिया के साथ बातचीत उन्नत चरण में थी। उनके मुताबिक ऐसे में पूरे समूह में शामिल होने का औचित्य कमजोर था, खासकर तब जब चीन की भूमिका को लेकर रणनीतिक और आर्थिक संदेह बने हुए हैं।
उद्योग पर असर और निवेश नीति का संकेत
गोयल के अनुसार, सरकार ने RCEP पर फैसला लेने से पहले देशभर में 200 हितधारक परामर्श किए थे और उनमें से केवल तीन ने इसमें शामिल होने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग, किसान और कई क्षेत्र असमान प्रतिस्पर्धा और आर्थिक व्यवधान की आशंका से इस समझौते के खिलाफ थे, जिसके बाद नवंबर 2019 में भारत ने औपचारिक रूप से वार्ता से हटने का निर्णय लिया।चीन को लेकर सतर्क रुख के बावजूद मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत चुनिंदा क्षेत्रों में चीनी निवेश के लिए दरवाजा बंद नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया भर से निवेश का स्वागत करता है, बशर्ते वह वांछनीय क्षेत्रों में हो।
इसी संदर्भ में उन्होंने 2020 की Press Note 3 का उल्लेख किया, जिसे आर्थिक तनाव के समय भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण को रोकने के लिए लाया गया था। गोयल ने कहा कि यह व्यवस्था केवल चीन पर केंद्रित नहीं है, बल्कि भारत के साथ थल सीमा साझा करने वाले सभी देशों पर लागू होती है, और 2026 की Press Note 2 के जरिये स्वामित्व संबंधी कुछ प्रतिबंधों में ढील भी दी गई है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में पीयूष गोयल के उस बयान पर चर्चा की गई थी जिसमें उन्होंने दोहराया था कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत के RCEP में शामिल होने की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि इससे रणनीतिक जोखिम और घरेलू विनिर्माण पर दबाव बढ़ सकता है। उसी लेख में यह भी बताया गया था कि सरकार वांछनीय क्षेत्रों में चीन समेत थल-सीमा साझा करने वाले देशों से निवेश के लिए खुली है, लेकिन Press Note 3 के तहत संवेदनशील मामलों में कड़ी जांच जारी रहेगी और Press Note 2 (2026) के जरिए कुछ स्वामित्व संबंधी शर्तों में सीमित ढील दी गई है।
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