Ashutosh Sureka

Adani M2K को गुरुग्राम फ्लैट विवाद में खरीदारों को धनवापसी का आदेश

Adani M2K को गुरुग्राम फ्लैट विवाद में खरीदारों को धनवापसी का आदेश
खरीदारों को धनवापसी आदेश

गुरुग्राम की आवासीय परियोजना से जुड़ा एक पुराना उपभोक्ता विवाद अब डेवलपर अनुबंधों और खरीदार अधिकारों पर अहम कानूनी संकेत दे रहा है। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने नोएडा के एक दंपति के पक्ष में राहत देते हुए कहा कि शर्तों से जुड़े भुगतान को भुनाकर बाद में उन शर्तों को नकारना उचित नहीं है।

हाइलाइट्स

  • राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने Adani M2K Projects LLP को 49,71,504 रुपये ब्याज समेत खरीदारों को लौटाने का निर्देश दिया।
  • आयोग ने Oyster Grande परियोजना में खरीदारों के आपत्तियों को वैध करार दिया और फ्लैट आवंटन रद्द करने की कार्रवाई भी निरस्त की।
  • आदेश के अनुसार शेष भुगतान छह सप्ताह में देना होगा, अन्यथा 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा तथा 22.02 लाख रुपये की समायोजन की छूट दी गई है।

आयोग के आदेश और विवाद की पृष्ठभूमि

Financial Express की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने Adani M2K Projects LLP को रितु सिंह मान और सुरेंदर सिंह मान को 49,71,504 रुपये ब्याज समेत लौटाने का निर्देश दिया है और गुरुग्राम में उनके फ्लैट आवंटन को रद्द करने की कार्रवाई को भी निरस्त कर दिया है। आयोग की पीठ, जिसमें अध्यक्ष सदस्य डॉ. इंदर जीत सिंह और सदस्य शशि नंदकेोल्यार शामिल थे, ने माना कि खरीदारों की एकतरफा और अनुचित समझौते पर आपत्तियां वैध थीं।

विवाद की शुरुआत अक्टूबर 2012 में हुई थी, जब दंपति को सेक्टर 102/102A, गुरुग्राम स्थित Oyster Grande परियोजना में तीन बेडरूम का अपार्टमेंट पेश किया गया। दंपति ने यूनिट बुक करने के लिए 8 लाख रुपये दिए और मई 2013 तक 32 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया। जनवरी 2013 में उन्हें अपार्टमेंट A-003 के लिए प्रोविजनल अलॉटमेंट लेटर मिला था।

मई 2013 में बिल्डर ने 60 पन्नों का Apartment Buyers Agreement भेजा, जिस पर खरीदारों ने 22 मई 2013 को आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि यह दस्तावेज अत्यधिक एकतरफा है, जिसमें अलॉटी के अधिकार सीमित किए गए हैं जबकि डेवलपर को अधिक समय और सीमित जवाबदेही दी गई है। उन्होंने या तो संतुलित संशोधन मांगे या फिर ब्याज सहित धनवापसी की मांग की।

जनवरी 2014 में Adani M2K ने 16 लाख रुपये से अधिक की अतिरिक्त मांग उठाई। दंपति ने यह रकम चेक के जरिए भेजी, लेकिन स्पष्ट शर्त रखी कि डेवलपर उनके प्रस्तावित संशोधन स्वीकार करे; इसके साथ संशोधित समझौते का मसौदा भी भेजा गया। आयोग ने माना कि डेवलपर ने चेक भुनाया, लेकिन बाद में बताया कि कोई बदलाव स्वीकार नहीं किया जाएगा, और यही आचरण मामले का केंद्रीय बिंदु बन गया।

रियल एस्टेट क्षेत्र और खरीदारों पर असर

मामला बाद में डिमांड नोटिस, जुलाई 2015 के प्री-कैंसलेशन नोटिस और 5 अगस्त 2016 के औपचारिक रद्दीकरण तक पहुंचा। उपभोक्ता कार्यवाही के दौरान बिल्डर ने जुलाई 2021 में 22.02 लाख रुपये लौटाए, लेकिन इसमें बिक्री मूल्य का 15 प्रतिशत अर्नेस्ट मनी तथा GST, सर्विस टैक्स और VAT से जुड़ी कटौतियां शामिल थीं।

आयोग ने डेवलपर का यह तर्क नहीं माना कि खरीदार किस्तों में चूक कर रहे थे और बार-बार अवसर मिलने के बावजूद समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर रहे थे। आदेश में कहा गया कि खरीदार शुरू से अपनी आपत्तियां लगातार दर्ज कराते रहे, इसलिए उनकी चिंताओं का समाधान हुए बिना आगे भुगतान रोकना उचित था।

आयोग ने Adani M2K को प्रत्येक जमा राशि की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ कुल 49,71,504 रुपये अदा करने को कहा है। आदेश में 1,16,232 रुपये की TDS कटौती भी शामिल है, जो आवश्यक TDS प्रमाणपत्र जमा होने पर देय होगी; 2021 में लौटाए गए 22.02 लाख रुपये इस कुल देय राशि से समायोजित होंगे। शेष भुगतान छह सप्ताह के भीतर करना होगा, अन्यथा 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।

यह फैसला ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां खरीदार मानक बिल्डर अनुबंधों को अनुचित बताते हुए चुनौती देते हैं। उपभोक्ता कानून के नजरिये से यह संदेश स्पष्ट है कि यदि भुगतान किसी स्पष्ट शर्त से जुड़ा हो, तो उसे स्वीकार कर बाद में शर्तों से इनकार करना डेवलपर के लिए धनवापसी और ब्याज देनदारी का आधार बन सकता है।

RCEP में भारत के शामिल न होने पर हमारी पिछली रिपोर्ट में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के उस रुख को रेखांकित किया गया था कि सरकार के पास इस व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की कोई योजना नहीं है। उस लेख में घरेलू उद्योग पर संभावित दबाव, व्यापार घाटे के जोखिम और चीन से जुड़ी रणनीतिक सतर्कता के तर्कों के साथ यह भी बताया गया था कि निवेश नीति में Press Note 3 के तहत कड़ी जांच जारी रहते हुए चुनिंदा स्वामित्व शर्तों में सीमित ढील की बात सामने आई थी।

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