भारत में परिसमापन प्रक्रिया नियमों में संशोधन, हितधारक सूची अपडेट पर नई समयसीमा
भारत में दिवाला परिसमापन ढांचे के तहत हितधारक जानकारी को अद्यतन करने की प्रक्रिया में नियामकीय बदलाव किया गया है। नए संशोधन के अनुसार, लिक्विडेटर अतिरिक्त जानकारी मिलने पर हितधारकों की सूची में प्रविष्टि बदल सकेगा और उसे 30 दिनों के भीतर न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को इसकी सूचना देनी होगी।
हाइलाइट्स
- Insolvency and Bankruptcy Board of India (Liquidation Process) (Fifth Amendment) Regulations, 2026 ने नियम 31 के उप-विनियम (3) और (4) को प्रतिस्थापित किया।
- संशोधन के अनुसार, लिक्विडेटर को हितधारकों की सूची में बदलाव के बाद 30 दिनों में न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को अनिवार्य रूप से सूचना देनी होगी।
- नए प्रावधानों से दिवाला और परिसमापन मामलों में रिकॉर्ड प्रबंधन, नियामकीय अनुपालन और पारदर्शिता में सुधार संभव है।
नियम 31 में संशोधन का दायरा
जैसा कि Insolvency and Bankruptcy Board of India के अनुसार, Insolvency and Bankruptcy Board of India (Liquidation Process) (Fifth Amendment) Regulations, 2026 के जरिये 2016 के परिसमापन प्रक्रिया विनियमों में बदलाव किया गया है। यह संशोधन विशेष रूप से विनियम 31 के उप-विनियम (3) और (4) के स्थान पर नया उप-विनियम लागू करता है।संशोधित प्रावधान के तहत लिक्विडेटर तब हितधारकों की सूची में किसी प्रविष्टि को संशोधित कर सकता है, जब उसे ऐसी अतिरिक्त जानकारी मिले जो बदलाव को उचित ठहराती हो। इसके बाद लिक्विडेटर को इस संशोधन की सूचना 30 दिनों के भीतर न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को देनी होगी।
नियमों को Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 की धारा 196 की उप-धारा (1) के खंड (aa) और (t), तथा धारा 240 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए अधिसूचित किया गया है। ये नियम आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभाव में आते हैं।
दिवाला समाधान ढांचे पर संभावित असर
यह बदलाव परिसमापन कार्यवाही के दौरान हितधारकों के रिकॉर्ड को अधिक अद्यतन और प्रक्रियागत रूप से स्पष्ट रखने की दिशा में देखा जा रहा है। अतिरिक्त जानकारी सामने आने पर सूची संशोधित करने की स्पष्ट अनुमति, दावों और हितों के दस्तावेजीकरण में अधिक लचीलापन दे सकती है।साथ ही, 30 दिनों के भीतर न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को सूचना देने की अनिवार्यता से प्रक्रिया में जवाबदेही बढ़ने की संभावना है। इससे दिवाला और परिसमापन मामलों में रिकॉर्ड प्रबंधन, नियामकीय अनुपालन और कार्यवाही की पारदर्शिता पर प्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
हमारी पहले की रिपोर्ट में कॉरपोरेट देनदारों के व्यक्तिगत गारंटरों पर अंतरिम मोरेटोरियम समाप्त होने से जुड़े बदलाव को रेखांकित किया गया था, जो 26 मई, 2026 से लागू है और उस तारीख तक निर्णायक प्राधिकरण के समक्ष लंबित आवेदनों पर भी असर डालता है। इसमें बताया गया था कि न्यायिक व्याख्याओं और नियामकीय स्पष्टता के बाद ऋण वसूली कार्यवाहियों में व्यक्तिगत गारंटरों को अंतरिम संरक्षण नहीं मिलेगा, जिससे प्रक्रिया की स्थिति अधिक स्पष्ट होती है।
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