भारत का जीएसटी ढांचा ईंधन शामिल करने पर राज्यों की सहमति पर निर्भर
केंद्र पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की संभावना पर विचार कर रहा है, लेकिन इसके लिए राज्यों की सहमति अहम शर्त बनी हुई है। साथ ही सरकार को मौजूदा दरों में बदलाव की गुंजाइश कम दिख रही है और वह 1.6 करोड़ से आगे करदाता आधार बढ़ाने पर जोर दे रही है।
हाइलाइट्स
- पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी दायरे में लाने के लिए राज्यों की सहमति अनिवार्य है, जिससे कर ढांचे में तत्काल बदलाव संभव नहीं।
- वित्त मंत्रालय मौजूदा जीएसटी दरों में बड़े परिवर्तनों की संभावना कम मानता है और शुल्क ढांचे में छूट देने से उलटे कर प्रभाव का खतरा है।
- जीएसटी परिषद ने 12 सदस्यीय स्थायी समिति का गठन किया, जिसमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात का स्थायी प्रतिनिधित्व रहेगा।
ईंधन पर जीएसटी और दर संरचना की सीमाएं
Forbes India के अनुसार, वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि पेट्रोलियम को जीएसटी के तहत लाने के लिए राज्यों को साथ लाना होगा, क्योंकि ईंधन कराधान उन कुछ क्षेत्रों में है जहां राज्यों के पास अब भी राजकोषीय लचीलापन बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी, लेकिन यदि कर संग्रह अधिक मजबूत होता है और भू-राजनीतिक अनिश्चितता का असर कम होता है, तो इस कदम को लेकर स्वीकार्यता बढ़ सकती है।वित्त मंत्रालय के सूत्र मौजूदा जीएसटी दरों में बड़े बदलाव की बहुत कम गुंजाइश देखते हैं। उनका कहना है कि फिलहाल जो प्रस्ताव सामने आते हैं, वे मूल रूप से रियायतों से जुड़े होते हैं, और ऐसी रियायतें उलटी शुल्क संरचना पैदा करने का जोखिम बढ़ाती हैं, खासकर तब जब अंतिम उत्पाद पर कर राहत दी जाती है।
करदाता आधार विस्तार और नई स्थायी समिति
केंद्र अब दरों में फेरबदल के बजाय जीएसटी आधार को मौजूदा 1.6 करोड़ से आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसके लिए पंजीकरण प्रक्रिया को अधिक सहज बनाने, बेहतर बी2सी इनवॉयसिंग लागू करने और अनुपालन करने वाले ई-इनवॉयस उपयोगकर्ताओं को हल्के ऑडिट जैसे प्रोत्साहन देने की योजना पर काम हो रहा है।जीएसटी परिषद ने तदर्थ अधिकारियों के समूहों की जगह 12 सदस्यीय स्थायी समिति बनाने का फैसला भी किया है। राज्यों को जीएसटी राजस्व और करदाताओं की संख्या को मिलाकर बने "जीएसटी फुटप्रिंट" के आधार पर बड़े, मध्यम और छोटे वर्गों में बांटा गया है, जिसमें पांच बड़े राज्यों, तीन मध्यम राज्यों और चार छोटे राज्यों का प्रतिनिधित्व होगा।
सूत्रों ने पुष्टि की है कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात पांच बड़े राज्य हैं जो स्थायी रूप से इस समिति में बने रहेंगे, जबकि अन्य राज्यों का प्रतिनिधित्व हर दो वर्ष में बदलेगा। सरकार का मानना है कि भरोसेमंद और निष्पक्ष व्यवस्था करदाताओं को अनुपालन की दिशा में प्रोत्साहित कर सकती है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में जीएसटी व्यवस्था को भरोसा-आधारित प्रशासन की दिशा में ले जाने की तैयारी पर चर्चा की गई थी, जिसमें बड़ी संख्या में जीएसटी अपराधों को आपराधिक कानून के दायरे से बाहर करने और प्रवर्तन का जोर गिरफ्तारी की बजाय वित्तीय वसूली पर रखने का प्रस्ताव शामिल था। इसमें रिफंड को तेज करने, रिटर्न/संशोधन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और इनपुट टैक्स क्रेडिट की सुरक्षा जैसे प्रक्रियात्मक व संरचनात्मक बदलावों का खाका भी बताया गया था, जिन्हें चरणबद्ध तरीके से लागू करने की संभावना जताई गई थी।
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