Orkus Private Limited के समाधान योजना को NCLT की मंजूरी

Orkus Private Limited के समाधान योजना को NCLT की मंजूरी
NCLT ने समाधान योजना मंजूर की

दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत Orkus Private Limited के लिए पेश की गई समाधान योजना को न्यायाधिकरण से अंतिम स्वीकृति मिल गई है। लेनदारों की समिति पहले ही सितंबर 2024 की बैठक में इस प्रस्ताव को 100 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी के साथ मंजूरी दे चुकी थी, जिससे कंपनी और उससे जुड़े हितधारकों पर इसके क्रियान्वयन की बाध्यता बनती है।

हाइलाइट्स

  • NCLT ने CP (IB) No. 453/ND/2022 में Orkus Private Limited की समाधान योजना को Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 के तहत मंजूरी दी।
  • लेनदारों की समिति ने 24-25 सितंबर 2024 की आठवीं बैठक में समाधान योजना को 100 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी से स्वीकृत किया।
  • GST दावों में स्पष्टता के बाद न्यायाधिकरण आदेशित किया कि Orkus Private Limited, कर्जदाता और सभी हितधारक योजना को लागू करने के लिए बाध्य हैं।

समाधान योजना की मंजूरी और प्रक्रिया

जैसा कि Insolvency and Bankruptcy Board of India के अनुसार बताया गया है, CP (IB) No. 453/ND/2022 में JPM Industries Limited द्वारा परिचालन ऋणदाता के रूप में दायर मामले में Orkus Private Limited के समाधान पेशेवर अजय गुप्ता ने सतेंद्र कुमार गुप्ता की ओर से प्रस्तुत समाधान योजना की मंजूरी मांगी थी। यह आवेदन IA-61/2024 के तहत दायर किया गया था और न्यायाधिकरण ने माना कि योजना Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 के प्रावधानों के अनुरूप है।

लेनदारों की समिति ने अपने आठवें बैठक में, जो 24-25 सितंबर 2024 को हुई थी, इस योजना को 100 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी के साथ स्वीकृत किया था। कार्यवाही के दौरान GST दावों में पाई गई विसंगतियों पर स्पष्टीकरण भी दिया गया, जिसके बाद लेनदारों में वितरण की राशि को स्पष्ट किया गया।

कर्जदाताओं और हितधारकों पर असर

न्यायाधिकरण ने कहा कि समाधान योजना न्यायिक जांच की कसौटी पर खरी उतरती है, जिसके बाद आवेदन को मंजूरी दे दी गई। इस आदेश के साथ Orkus Private Limited, उसके कर्जदाता और अन्य संबंधित हितधारक योजना को लागू करने के लिए बाध्य हैं।

यह फैसला भारत की दिवाला समाधान व्यवस्था में उस चरण को दर्शाता है जहां लेनदारों की स्वीकृति के बाद न्यायिक समर्थन मिलने पर पुनर्गठन योजना बाध्यकारी रूप ले लेती है। GST दावों से जुड़ी स्पष्टता भी यह संकेत देती है कि वितरण संरचना पर विवाद या अस्पष्टता को अंतिम मंजूरी से पहले संबोधित किया जा रहा है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की संभावनाओं और इसमें राज्यों की सहमति को निर्णायक शर्त के रूप में रेखांकित किया गया था। उसमें यह भी बताया गया था कि सरकार फिलहाल दरों में बड़े बदलाव की बजाय करदाता आधार बढ़ाने और जीएसटी परिषद की 12 सदस्यीय स्थायी समिति के जरिए व्यवस्था को अधिक स्थिर व भरोसेमंद बनाने पर जोर दे रही है।

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