नीति आयोग ने 2047 लक्ष्य के लिए शहरी शासन और नगर वित्त सुधार का रोडमैप रखा
जनााग्रह द्वारा आयोजित अर्बन कॉन्क्लेव 2026 में नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा कहते हैं कि भारत के विकसित राष्ट्र बनने के 2047 के लक्ष्य की सफलता शहरी शासन में “रीसेट” पर निर्भर है, और इसके लिए क्षेत्रीय योजना, आर्थिक योजना, जीवन-योग्यता-केंद्रित विकास तथा सशक्त नगर सरकारों का संयुक्त एजेंडा जरूरी है।
हाइलाइट्स
- नीति आयोग ने 2047 लक्ष्य हेतु शहरी शासन सुधार के लिए चार-भागीय रणनीति पेश की, जिसमें प्रशासनिक सीमा-रहित क्षेत्रीय योजना और सशक्त नगर सरकारें शामिल हैं।
- शहरों की वित्तीय क्षमता के लिए संपत्ति कर सुधार, लागत-आधारित शुल्क और शहरी अनुदान को 45 प्रतिशत तक बढ़ाने का सुझाव दिया गया; भारत में म्युनिसिपल बांड का योगदान GDP का सिर्फ 0.02 प्रतिशत है।
- 2050 तक अनुमानित शहरी आबादी 85 करोड़ पहुंचने, वर्टिकल हाउसिंग व मास्टर प्लान अपडेट करने और किफायती आवास पर बल दिया गया।
अर्बन कॉन्क्लेव 2026 में चार-भाग रणनीति
राजीव गौबा के अनुसार, Forbes India भारत में शहरीकरण की ऐतिहासिक रूप से धीमी गति का उल्लेख करते हैं और कहते हैं कि फिलहाल करीब 35 प्रतिशत आबादी ही शहरी है। वह इसकी तुलना U.S. और जापान जैसे विकसित देशों से करते हैं, जहां शहरी आबादी 80 से 90 प्रतिशत के बीच बताई जाती है। गौबा के मुताबिक जनसांख्यिकीय बदलाव के साथ यह अंतर तेजी से घट रहा है और शहरी बदलाव अब विकल्प नहीं, बल्कि तात्कालिक जरूरत है।गौबा एक चार-भाग “स्ट्रैटेजिक रीसेट” पेश करते हैं, जिसमें प्रशासनिक सीमाओं से परे क्षेत्रीय योजना पर जोर है। वह शहरों की ताकत और पारस्परिक निर्भरता का लाभ उठाने के लिए आर्थिक योजना की बात करते हैं। वह भूमि-उपयोग के बजाय आर्थिक आधार पर, और जीवन-योग्यता को केंद्र में रखकर नियोजन को आगे बढ़ाने की जरूरत बताते हैं। साथ ही वह पूरी तरह सशक्त नागरिक सरकारों की मांग करते हैं, और लंदन या न्यूयॉर्क जैसे शहरों के उदाहरण देकर भारतीय महापौरों की सीमित वित्तीय क्षमता की तुलना करते हैं।
शहरों का वित्त, कर ढांचा और बांड बाजार
गौबा कहते हैं कि प्रभावी शहरी परिवर्तन के लिए नगर निकायों को अधिक अधिकार और मजबूत वित्तीय आधार चाहिए। वह संपत्ति कर के युक्तिकरण और लागत-प्रतिबिंबित उपयोगकर्ता शुल्क को शहरों की वित्तीय क्षमता बढ़ाने के प्रमुख औजार के रूप में रखते हैं। उनके मुताबिक यह दिशा 16वें वित्त आयोग के उस फैसले के अनुरूप है, जिसमें शहरी अनुदानों का हिस्सा 45 प्रतिशत तक बढ़ाने का निर्णय शामिल है। वह इसे नीतिगत प्रयासों के असरदार होने की शर्त के तौर पर देखते हैं।वह शहरी वित्तपोषण में असमानता और साधनों की कमी की ओर भी संकेत करते हैं। गौबा के अनुसार भारत में म्युनिसिपल बांड का उपयोग लगभग न के बराबर है और यह GDP के केवल 0.02 प्रतिशत के बराबर बताया जाता है। इसकी तुलना में U.S. में यह आंकड़ा 15 प्रतिशत के आसपास होने की बात कही जाती है। वह संकेत देते हैं कि शहरों की आर्थिक क्षमता खोलने के लिए वित्तीय साधनों का विस्तार और स्थानीय राजस्व सुधार साथ-साथ चलना चाहिए।
हाउसिंग, मास्टर प्लान और शहरी परिसंपत्तियों का उपयोग
गौबा कहते हैं कि कई भारतीय शहरों में अब भी मास्टर प्लान का अभाव है, जिससे विकास की दिशा और निवेश का समन्वय प्रभावित होता है। वह यह भी कहते हैं कि कई जगहों पर प्रतिबंधात्मक फ्लोर स्पेस इंडेक्स से आवास लागत बढ़ती है। उनके मुताबिक शहरों को अपने मास्टर प्लान अपडेट करने और नियोजन को बदलती जरूरतों के अनुरूप करने की आवश्यकता है। वह इसे शहरी अर्थव्यवस्था की दक्षता और रहने योग्य शहरों के लक्ष्य से जोड़ते हैं।गौबा “ट्रांजिट हब” के पास वर्टिकल हाउसिंग को अपनाने की वकालत करते हैं ताकि बढ़ती आबादी और रोजगार-आधारित माइग्रेशन का दबाव संभाला जा सके। वह कहते हैं कि खेती से मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं की ओर कार्यबल के शिफ्ट होने से शहरी केंद्रों की ओर आंदोलन बढ़ता है। उनके अनुसार 2050 तक शहरी आबादी 50 करोड़ से बढ़कर 85 करोड़ होने का अनुमान है, जिससे लगभग आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी। इसी संदर्भ में वह प्रवासी श्रमिकों और शहरी केंद्रों में आने वाले युवा पेशेवरों के लिए किफायती आवास की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं।
हमने पहले केंद्र सरकार की भारत ऑद्यौगिक विकास योजना (BHAVYA) पर रिपोर्ट किया था, जिसके तहत 2026-27 से 2031-32 के बीच 100 ‘प्लग-एंड-प्ले’ औद्योगिक पार्क विकसित करने और 34,000 एकड़ निवेश-तैयार भूमि उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। उस रिपोर्ट में योजना की रूपरेखा, NICDC की नोडल भूमिका, ‘चैलेंज मोड’ के जरिए चयन प्रक्रिया और प्रति एकड़ वित्तीय सहायता के जरिए यूटिलिटीज, फैक्ट्री शेड, टेस्टिंग लैब व श्रमिक आवास जैसी अवसंरचना तैयार करने की बात शामिल थी।
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