भारत ने पड़ोसी देशों से गैर-नियंत्रक एफडीआई के नियमों में ढील दी

भारत ने पड़ोसी देशों से गैर-नियंत्रक एफडीआई के नियमों में ढील दी
एफडीआई नियमों में ढील

केंद्रीय मंत्रिमंडल के 10 मार्च के फैसले के अनुसार, भारत अब भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से 10 प्रतिशत तक गैर-नियंत्रक निवेश को स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति दे रहा है, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों पर प्रेस नोट 3 के तहत मंजूरी की शर्त बनी रहती है। यह बदलाव ऐसे समय में आता है जब अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पहली बार 100 अरब डॉलर से ऊपर, 102 अरब डॉलर, पर पहुंच गया। नीति का उद्देश्य व्यापार और निवेश के बीच असंतुलन कम करना, प्रौद्योगिकी साझेदारियों को बढ़ाना और भारतीय कंपनियों के लिए पूंजी के स्रोतों का दायरा विस्तृत करना है।

हाइलाइट्स

  • भारत ने 2020 में लागू प्रेस नोट 3 के तहत भूमि सीमा साझेदार देशों से गैर-नियंत्रक एफडीआई के नियमों में ढील देते हुए सीमित स्वचालित मार्ग की अनुमति दी।
  • नवीन नीति के तहत पूंजीगत वस्तु विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कंपोनेंट, पॉलीसिलिकॉन जैसे क्षेत्रों में एफडीआई मंजूरी की प्रक्रिया 60 दिनों के भीतर होगी तथा इकाइयों में बहुमत भारतीय स्वामित्व अनिवार्य रहेगा।
  • 2021-2024 में चीनी एफडीआई घटकर 6.735 करोड़ डॉलर, कुल का 0.34 प्रतिशत हुआ, लेकिन नए नियम टेक स्टार्टअप, डीपटेक कंपनियों व विनिर्माण क्षेत्र को अतिरिक्त निवेश अवसर देंगे।

नीतिगत बदलाव और निवेश दायरा

2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने प्रेस नोट 3 के जरिए भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी थी। उस कदम का मकसद भारतीय कंपनियों में अवसरवादी अधिग्रहण को रोकना था, लेकिन इससे प्रौद्योगिकी कंपनियों और स्टार्टअप में वैश्विक वेंचर कैपिटल तथा प्राइवेट इक्विटी निवेश भी प्रभावित हुआ। अब संशोधित व्यवस्था के तहत गैर-नियंत्रक निवेश को सीमित दायरे में स्वचालित मार्ग से अनुमति मिलती है, जिससे पूंजी प्रवाह के लिए कुछ राहत बनने की उम्मीद है।

सरकार ने कहा है कि महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए मंजूरी व्यवस्था जारी रहेगी। संशोधन पूंजीगत वस्तु विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक सामान, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, पॉलीसिलिकॉन और इन्गट-वेफर जैसे क्षेत्रों में निवेश मंजूरी को 60 दिनों के भीतर तेज करने का प्रावधान करता है। ऐसे मामलों में निवेश प्राप्त करने वाली इकाई में बहुमत हिस्सेदारी भारतीय निवासी नागरिकों या भारतीय संस्थाओं के पास रहनी चाहिए।

यह बदलाव उन क्षेत्रों के लिए अहम माना जा रहा है जिन्होंने पहले चीन से पूंजी आकर्षित की थी, जिनमें उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक स्टार्टअप, पावर इक्विपमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रिक वाहन और सौर कंपोनेंट शामिल हैं। 2000 से 2020 के बीच भारत में चीनी एफडीआई का अनुमान 2.4 अरब डॉलर, कुल एफडीआई का 0.45 प्रतिशत, था। प्रेस नोट 3 लागू होने के बाद 2021 से 2024 के दौरान यह घटकर 6.735 करोड़ डॉलर, कुल एफडीआई का 0.34 प्रतिशत, रह गया।

व्यापार घाटा और क्षेत्रीय असर

भारत के लिए यह नीति बदलाव एक व्यापक आर्थिक पृष्ठभूमि में सामने आता है, जहां चीन देश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। भारत चीन से इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, दूरसंचार उपकरण, मशीनरी और एपीआई जैसे मध्यवर्ती सामान बड़े पैमाने पर आयात करता है। इसी वजह से व्यापारिक निर्भरता और घरेलू विनिर्माण क्षमता के बीच संतुलन का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

हालिया आंकड़े दिखाते हैं कि अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 102 अरब डॉलर तक पहुंच गया। नीति निर्माताओं की उम्मीद है कि निवेश नियमों में सीमित ढील से भारतीय कंपनियों को नई तकनीक, संयुक्त उद्यम और आपूर्ति शृंखला साझेदारी के अवसर मिलेंगे। इससे आयात पर निर्भरता घटाने और दीर्घकाल में विनिर्माण क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

ट्रैक्सन के आंकड़ों के अनुसार, 2016 से 2025 के दौरान रिटेल, फूड एवं एग्रीटेक, ट्रांसपोर्ट एवं लॉजिस्टिक्स, फिनटेक और एंटरप्राइज टूल्स ऐसे प्रमुख क्षेत्र रहे हैं जिन्हें चीनी वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी निवेश मिला। नई व्यवस्था विशेष रूप से ग्रोथ-स्टेज टेक स्टार्टअप और डीपटेक कंपनियों के लिए फंडिंग विकल्प बढ़ा सकती है। इससे भारत की आपूर्ति शृंखला विविधीकरण और विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थिति मजबूत करने की संभावना बनती है।

उद्योग की प्रतिक्रिया और आगे की चुनौतियां

इंडियन वेंचर एंड अल्टरनेट कैपिटल एसोसिएशन के अध्यक्ष रजत टंडन ने कहा कि उद्योग अब मानक संचालन प्रक्रिया से जुड़ी स्पष्टता का इंतजार कर रहा है। उनके अनुसार यह फैसला फंड मैनेजरों, जनरल पार्टनरों, संस्थापकों और टेक, मैन्युफैक्चरिंग, हार्डवेयर, ऊर्जा प्रौद्योगिकी तथा बैटरी विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को सहारा दे सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे चीनी निवेशकों के बीच भारत में निवेश जारी रखने का भरोसा बढ़ सकता है।

डेलॉइट इंडिया की पार्टनर नेहा अग्रवाल का कहना है कि मौजूदा वैश्विक माहौल में आपूर्ति शृंखला विविधीकरण और आत्मनिर्भरता बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनके अनुसार भारत को सुरक्षा और खुलेपन के बीच संतुलन रखने वाली, जोखिम-आधारित और क्षेत्र-विशिष्ट एफडीआई नीति अपनानी चाहिए। इसमें संवेदनशील क्षेत्रों के लिए मजबूत जांच तंत्र, स्पष्ट मंजूरी प्रक्रियाएं और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की तुलना में रणनीतिक विनिर्माण क्षेत्रों को प्राथमिकता देना शामिल होना चाहिए।

आगे की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार परिचालन दिशानिर्देश कितनी स्पष्टता से जारी करती है और मंजूरी प्रक्रिया कितनी पूर्वानुमेय बनती है। यदि नीति क्रियान्वयन संतुलित रहता है, तो भारत विदेशी पूंजी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और घरेलू उत्पादन क्षमता के बीच बेहतर तालमेल बना सकता है। साथ ही, रणनीतिक संवेदनशीलता को देखते हुए निगरानी और अनुपालन ढांचा इस नीति का केंद्रीय हिस्सा बना रहता है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में लोकसभा से पारित जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा की गई थी, जो 23 मंत्रालयों के तहत 79 केंद्रीय कानूनों में बदलाव कर छोटे उल्लंघनों को गैर-अपराधी बनाने और अनुपालन बोझ घटाने का प्रस्ताव रखता है। उस लेख में बताया गया था कि दंड व्यवस्था के पुनर्संतुलन और प्रशासनिक निपटान पर जोर से लाइसेंसिंग व निरीक्षण-प्रधान क्षेत्रों में परिचालन अनिश्चितता और लागत घट सकती है, जिससे निवेश माहौल अधिक पूर्वानुमेय बन सकता है।

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