सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का श्रमबल भागीदारी स्तर मार्च में घटकर 41.9 प्रतिशत पर आ गया है, जो पिछले पांच महीनों का सबसे निचला स्तर है। जून 2025 से दिसंबर तक दिखी भागीदारी की बढ़त 2026 की पहली तिमाही में कमजोर पड़ती दिख रही है। आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि रोजगार बाजार में महिलाओं, खासकर युवा महिलाओं, के लिए दबाव अधिक बना हुआ है।
हाइलाइट्स
- मार्च 2024 में भारत की कुल श्रमबल भागीदारी 41.9 प्रतिशत रही, जो दिसंबर 2023 के 42.5 प्रतिशत के शिखर से नीचे है।
- महिला श्रमबल भागीदारी मार्च में 26.4 प्रतिशत पर रही, जबकि युवती बेरोजगारी शहरी क्षेत्रों में 24.5 प्रतिशत तक पहुंच गई।
- श्रम बाजार में असमान सुधार और महिलाओं-युवाओं की उच्च बेरोजगारी से नीति निर्माताओं पर केंद्रित रोजगार रणनीतियों की आवश्यकता और बढ़ी।
मार्च के आंकड़ों में भागीदारी की रफ्तार कमजोर
कुल श्रमबल आंकड़ों में भागीदारी स्तर जून 2025 के 41 प्रतिशत से बढ़ते हुए दिसंबर में 42.5 प्रतिशत के शिखर तक पहुंचा था। इसके बाद पहली तिमाही में इसमें नरमी आती है और मार्च का स्तर 41.9 प्रतिशत पर दर्ज होता है। इससे संकेत मिलता है कि त्योहारों के मौसम में दिखी रोजगार भागीदारी की गति अब कायम नहीं रह पाती है।
महिला श्रमबल भागीदारी में गिरावट और अधिक स्पष्ट है। मार्च में महिला औसत भागीदारी 26.4 प्रतिशत पर आ जाती है, जो दिसंबर के 27.2 प्रतिशत के शिखर से नीचे है। 15 से 29 वर्ष की महिलाओं में यह दर जनवरी के 23.2 प्रतिशत से घटकर मार्च में 22.3 प्रतिशत रह जाती है, जो दो महीनों में लगभग एक प्रतिशत अंक की कमी दिखाती है।
युवा महिलाओं में बेरोजगारी का दबाव अधिक
मार्च में सभी आयु वर्गों को मिलाकर महिलाओं की बेरोजगारी दर 5.3 प्रतिशत रहती है, जो पुरुषों के 5 प्रतिशत और राष्ट्रीय औसत 5.1 प्रतिशत से थोड़ा ऊपर है। हालांकि युवाओं के बीच यह अंतर काफी अधिक चौड़ा हो जाता है। 15 से 29 वर्ष की महिलाओं में बेरोजगारी दर 17.7 प्रतिशत तक पहुंचती है, जबकि युवा पुरुषों में यह 14.3 प्रतिशत और कुल युवा औसत 15.2 प्रतिशत है।
युवा महिलाओं और युवा पुरुषों की बेरोजगारी दर के बीच 3.4 प्रतिशत अंक का अंतर यह दिखाता है कि श्रम बाजार में महिलाओं की स्थिति तुलनात्मक रूप से अधिक कमजोर बनी हुई है। शहरी युवा महिलाओं पर दबाव और ज्यादा है, जहां मार्च में बेरोजगारी 24.5 प्रतिशत दर्ज होती है। इसके मुकाबले युवा ग्रामीण महिलाओं में यह दर 14.8 प्रतिशत है, जिससे शहरी और ग्रामीण श्रम बाजार के बीच असमानता भी सामने आती है।
रोजगार बाजार और नीति पर व्यापक संकेत
ये रुझान बताते हैं कि कार्यबल में भागीदारी बढ़ाने की चुनौती केवल कुल रोजगार सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लैंगिक और आयु आधारित अंतर भी अहम हैं। खासकर युवा महिलाओं के लिए रोजगार उपलब्धता, कौशल, सुरक्षा, आवागमन और शहरी अवसरों तक पहुंच जैसे कारक महत्वपूर्ण बने रहते हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो श्रम आपूर्ति, घरेलू आय और उपभोग से जुड़े व्यापक आर्थिक संकेतकों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
मार्च के आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि रोजगार बाजार में सुधार समान रूप से वितरित नहीं हो रहा है। कुल भागीदारी में नरमी और महिला बेरोजगारी के ऊंचे स्तर नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संकेत हैं। इससे महिलाओं और युवाओं पर केंद्रित रोजगार रणनीतियों की जरूरत और अधिक मजबूत होती है।
हमने पहले उत्तर प्रदेश में न्यूनतम वेतन के संशोधन और नोएडा में वेतन बढ़ोतरी की मांग से जुड़े श्रमिक विरोध पर रिपोर्ट किया था। उस रिपोर्ट में औद्योगिक श्रमिकों की औसत आय के राष्ट्रीय औसत से नीचे रहने, उत्पादकता बढ़ने के बावजूद मजदूरी वृद्धि के पीछे रहने और वेज बोर्ड के जरिए आगे की नीति प्रक्रिया पर असर जैसे पहलुओं को रेखांकित किया गया था।
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