केंद्र राष्ट्रीय फ्लोर वेज दर तेज करने की तैयारी में, उद्योग और राज्यों पर वेतन दबाव बढ़ा
एनसीआर में हालिया श्रमिक असंतोष और बढ़ती महंगाई के बीच केंद्र नई राष्ट्रीय फ्लोर वेज दर तय करने की प्रक्रिया तेज कर रहा है। प्रस्तावित ढांचा अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की लागत संरचना को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है, जिससे न्यूनतम वेतन पर राष्ट्रीय मानक तय हो सके।
हाइलाइट्स
- केंद्र सरकार दैनिक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को 176 रुपये से बढ़ाकर 350-450 रुपये के दायरे में अंतिम रूप देने की तैयारी में है।
- हरियाणा में अकुशल श्रमिकों की मासिक मजदूरी करीब 35 प्रतिशत बढ़ाकर 15,200 रुपये की गई, नोएडा/गाजियाबाद में 13,690 रुपये तक वृद्धि हुई।
- उपाय लागू होते ही राज्यों को न्यूनतम वेतन केंद्रीय फ्लोर दर से नीचे नहीं रखना होगा, जिससे उद्योगों पर वेतन लागत दबाव बढ़ सकता है।
क्षेत्रवार वेतन ढांचे पर तेजी
The Economic Times के अनुसार, केंद्र सरकार विभिन्न राज्यों, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और अलग-अलग श्रेणी के श्रमिकों के मौजूदा वेतन स्तर तथा महंगाई रुझानों की समीक्षा कर रही है। सरकार का लक्ष्य निकट भविष्य में क्षेत्र-विशिष्ट फ्लोर वेज दरों को अंतिम रूप देना है, ताकि यह दर गरीब, पहाड़ी या कम वेतन वाले राज्यों पर दंडात्मक बोझ न बने और फिर भी बढ़ती जीवन-यापन लागत को प्रतिबिंबित करे।
पाठ में कहा गया है कि केंद्र दैनिक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को 350 रुपये से 450 रुपये के दायरे में बढ़ाने पर विचार कर रहा है, जबकि मौजूदा 176 रुपये प्रतिदिन की दर 2017 में तय हुई थी। श्रम मंत्रालय कथित तौर पर कुशल, अर्द्धकुशल और अकुशल श्रमिकों के लिए संशोधित फ्लोर वेज ढांचा अंतिम रूप दे रहा है, जिसके बाद कोई भी राज्य अपनी अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी केंद्रीय मानक से नीचे नहीं रख सकेगा।
यह समीक्षा उत्तर प्रदेश और हरियाणा में हालिया वेतन आंदोलनों के बाद और तेज हुई है। नोएडा और गाजियाबाद में अकुशल श्रमिकों की मासिक मजदूरी 11,313 रुपये से बढ़ाकर 13,690 रुपये की गई है, जबकि हरियाणा ने अकुशल मासिक वेतन को लगभग 15,200 रुपये तक पहुंचाते हुए करीब 35 प्रतिशत बढ़ोतरी की है।
महंगाई, कारोबार और राज्यों पर असर
सरकार इस अभ्यास में बढ़ती महंगाई को भी शामिल कर रही है। खुदरा महंगाई फरवरी में 3.2 प्रतिशत से मार्च में 3.4 प्रतिशत तक बढ़ी, जबकि थोक महंगाई मार्च में 38 महीने के उच्च स्तर 3.9 प्रतिशत पर पहुंची, जिसे महंगे कच्चे तेल, ऊर्जा और विनिर्मित वस्तुओं से बल मिला।
प्रस्ताव लागू होने पर राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी न्यूनतम मजदूरी केंद्रीय फ्लोर से नीचे न जाए, हालांकि वे इससे ऊपर की दर तय कर सकेंगे। नोएडा जैसे औद्योगिक केंद्रों में कंपनियों, खासकर ठेका और अस्थायी श्रमिकों पर निर्भर इकाइयों, को वेतन संरचना में बदलाव करना पड़ सकता है, जबकि महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और तमिलनाडु जैसे बड़े औद्योगिक राज्य पहले से प्रस्तावित दायरे के करीब या उससे ऊपर बताए गए हैं।
पूर्व अधिकारियों और विशेषज्ञों का तर्क है कि वेतन संशोधन स्थानीय जीवन-यापन सूचकांकों के आधार पर हर साल होना चाहिए, ताकि अचानक बड़े झटकों से बचा जा सके। श्रमिक संगठनों के लिए यह कदम वेतन मानकीकरण की दिशा में अहम माना जा रहा है, लेकिन उद्योग के लिए मुख्य चुनौती लागत प्रतिस्पर्धा और बढ़ते मजदूरी दबाव के बीच संतुलन बनाए रखना है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में नोएडा में न्यूनतम वेतन बढ़ोतरी और उससे जुड़े श्रमिक विरोध की पृष्ठभूमि पर चर्चा की गई थी। इसमें दिखाया गया था कि उत्तर प्रदेश के औद्योगिक श्रमिक राष्ट्रीय औसत से कम कमाई कर रहे हैं और 2019-20 से 2023-24 के दौरान उत्पादकता बढ़ने के बावजूद मजदूरी वृद्धि तुलनात्मक रूप से कम रही। साथ ही, रिपोर्ट में 1 अप्रैल से लागू होने वाले अंतरिम संशोधन, वेज बोर्ड के गठन की प्रतीक्षा और उद्योगों की लागत संरचना पर संभावित दबाव का भी उल्लेख था।
- Forex
- Crypto