भारत में कल्याण योजनाएं चुनावी नतीजों को तय करती हैं, रुचिर शर्मा ने विकास बनाम वृद्धि का संतुलन बताया
मुंबई में मंगलवार को आयोजित एक सार्वजनिक बातचीत में निवेशक रुचिर शर्मा ने कहा कि भारत की चुनावी राजनीति में कल्याण योजनाएं और नकद सहायता अब विकास के एजेंडे जितनी ही नहीं, कई बार उससे अधिक निर्णायक हो रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटलीकरण से लाभ वितरण में रिसाव घटा है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले ऐसी घोषणाओं का बढ़ना राजकोषीय और वृद्धि संबंधी सवाल खड़े करता है।
हाइलाइट्स
- रुचिर शर्मा ने Express Adda में कहा कि भारत के राज्यों में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और कल्याण योजनाएं चुनावी अभियानों के अहम राजनीतिक औजार बन गए हैं।
- डिजिटलीकरण के चलते लाभ वितरण में रिसाव घटा है और वादों की डिलीवरी पहले से बेहतर हुई है, पर कई राहत योजनाएं चुनाव घोषणा से ठीक पहले शुरू होती हैं।
- शर्मा के अनुसार, भारत को तेज, टिकाऊ वृद्धि और व्यापक कल्याण व्यय के बीच संतुलन बनाना होगा, जैसा पूर्वी एशियाई देशों ने किया।
मुंबई संवाद में चुनावी कल्याण राजनीति पर जोर
इंडियन एक्सप्रेस समूह द्वारा आयोजित Express Adda सत्र में, रुचिर शर्मा ने कहा कि विभिन्न राज्यों में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और अन्य लाभ अब राजनीतिक दलों के लिए लगभग अनिवार्य चुनावी औजार बन चुके हैं। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव अभियानों के दौरान परिवारों के लिए हजारों रुपये तक की वित्तीय सहायता के वादे इस प्रवृत्ति को दिखाते हैं।
शर्मा ने कहा कि गरीबी की वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए सहायता योजनाओं का विरोध करना कठोर लग सकता है, क्योंकि ये तत्काल जरूरतों को संबोधित करती हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत में अब वादों की डिलीवरी पहले की तुलना में बेहतर हो रही है और डिजिटलीकरण के कारण रिसाव काफी हद तक कम हुआ है।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि कई नकद लाभ और कल्याण योजनाएं चुनाव की घोषणा से ठीक पहले सामने आती हैं। उनके मुताबिक, इससे यह धारणा बनती है कि ऐसी पहलें दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति से अधिक राजनीतिक गणना से प्रेरित हैं।
उच्च वृद्धि और व्यापक कल्याण के बीच आर्थिक दुविधा
शर्मा ने आर्थिक दृष्टि से तर्क दिया कि तेज वृद्धि और बहुत व्यापक कल्याण व्यय के बीच एक बुनियादी संतुलन साधना पड़ता है। उन्होंने चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे पूर्वी एशियाई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन अर्थव्यवस्थाओं ने अपने तेज वृद्धि चरणों में बड़े पैमाने की सहायता योजनाओं के बजाय बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विस्तार को प्राथमिकता दी।उनके अनुसार, दुनिया में ऐसा कोई स्थापित आर्थिक मॉडल नहीं दिखता जहां बड़े पैमाने के हैंडआउट और 9 से 10 प्रतिशत जैसी बहुत ऊंची, टिकाऊ वृद्धि साथ-साथ चलती हो। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि भारत को अंततः यह तय करना होगा कि वह कल्याण विस्तार के साथ मध्यम वृद्धि स्वीकार करता है या फिर अधिक कड़े राजकोषीय अनुशासन के साथ वृद्धि को प्राथमिकता देता है।
शर्मा इस बहस को केवल राजनीतिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक नीति का प्रश्न मानते हैं। जैसे-जैसे चुनावी प्रतिस्पर्धा में कल्याण का महत्व बढ़ता है, वैसे-वैसे नीति निर्माताओं और मतदाताओं पर यह जिम्मेदारी भी बढ़ती है कि वे उसके वित्तीय और विकासगत प्रभावों का आकलन करें।
हमारी पिछली रिपोर्ट में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जय) के तेजी से बढ़ते पैमाने पर चर्चा की गई थी, जहां अधिकृत भर्तियां 10.62 करोड़ तक पहुंचीं और मुफ्त अस्पताल देखभाल का कुल मूल्य 1.51 लाख करोड़ रुपये से ऊपर गया। हमने यह भी बताया था कि राज्यों के बीच उपयोग और लागत में बड़ा अंतर दिखता है—दक्षिणी राज्यों में भर्ती/उपयोग अधिक है—और सितंबर 2024 में 70+ वरिष्ठ नागरिकों के लिए 5 लाख रुपये सालाना कवर के विस्तार से कवरेज और बढ़ा।
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