भारत में नियोक्ता वर्क-फ्रॉम-होम से इनकार कर सकते हैं, मोदी की ईंधन बचत अपील के बीच श्रम कानून में बाध्यता नहीं
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच ईंधन तथा विदेशी मुद्रा बचाने की अपील ने भारत में दफ्तर उपस्थिति और वर्क-फ्रॉम-होम नीति पर बहस फिर तेज कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यात्रा, ईंधन खपत और गैर-जरूरी खर्च कम करने का आह्वान किया है, लेकिन निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को दूरस्थ काम का कोई सार्वभौमिक वैधानिक अधिकार अभी प्राप्त नहीं है।
हाइलाइट्स
- भारत में वर्क-फ्रॉम-होम कर्मचारी का सार्वभौमिक कानूनी अधिकार नहीं है, यह कंपनी नीति और अनुबंध पर आधारित है।
- प्रधानमंत्री मोदी ने ईंधन बचत हेतु कंपनियों से ऑनलाइन बैठकें और दूरस्थ काम अपनाने की अपील की, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।
- यदि ऊर्जा संकट या परिवहन बाधाएं बढ़ती हैं तो सरकार आपदा कानूनों के तहत फिर से वर्क-फ्रॉम-होम को अस्थायी रूप से अनिवार्य कर सकती है।
वर्क-फ्रॉम-होम पर कानूनी स्थिति
Financial Express Online से बातचीत में शिक्षाविद, वकील और महिला अधिकार कार्यकर्ता प्रमिला नेसरगी ने कहा कि घर से काम की व्यवहारिकता मुख्य रूप से काम की प्रकृति पर निर्भर करती है। उनके अनुसार भारत में हाइब्रिड या वर्क-फ्रॉम-होम व्यवस्था को लेकर कानून में व्यापक संशोधन नहीं हुआ है, इसलिए कई मामलों में निर्णय नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहमति तथा कंपनी की आंतरिक नीति पर टिका रहता है।
भारत में अभी ऐसा कोई समर्पित कानून नहीं है जो कर्मचारियों को दूरस्थ काम का लागू करने योग्य सार्वभौमिक अधिकार देता हो। अधिकांश निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए दफ्तर उपस्थिति, कार्यस्थल और कामकाज की व्यवस्था रोजगार अनुबंध, कंपनी की मानव संसाधन नीतियों और राज्यों के दुकानदार एवं वाणिज्यिक प्रतिष्ठान कानूनों के तहत तय होती है।
नई श्रम संहिताएं, जो अब तक पूरे देश में पूरी तरह लागू नहीं हुई हैं, पहली बार रिमोट और हाइब्रिड कार्य व्यवस्था जैसी अवधारणाओं को मान्यता देती हैं। फिर भी ये प्रावधान कर्मचारियों को स्वतः वर्क-फ्रॉम-होम का अधिकार नहीं देते, बल्कि ऐसी व्यवस्था को आमतौर पर नियोक्ता और कर्मचारी के बीच पारस्परिक सहमति पर आधारित मानते हैं।
कुछ सीमित अपवाद मौजूद हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत जहां संभव हो वहां उचित सुविधा देने की अपेक्षा की जाती है, जबकि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 प्रसव के बाद महिलाओं के लिए काम की प्रकृति के अनुरूप वर्क-फ्रॉम-होम की अनुमति का प्रावधान करता है, लेकिन यहां भी यह स्वतः लागू अधिकार नहीं बनता।
सरकारी अपील और उद्योग पर असर
प्रधानमंत्री ने वडोदरा और तेलंगाना में सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान कंपनियों और नागरिकों से ईंधन खपत घटाने के लिए दूरस्थ काम, ऑनलाइन बैठकें और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे उपाय अपनाने की अपील की है। उन्होंने अनावश्यक ईंधन उपयोग, टाली जा सकने वाली विदेशी यात्राओं और गैर-जरूरी सोने की खरीद को कम करने की भी सलाह दी है, ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घट सके।कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह अपील फिलहाल परामर्शात्मक है, बाध्यकारी नहीं। इसका अर्थ यह है कि कंपनियां अपने परिचालन, उत्पादकता जरूरतों और कार्य की प्रकृति के आधार पर तय कर सकती हैं कि वे पूर्ण दफ्तर मॉडल रखें, हाइब्रिड व्यवस्था अपनाएं या सीमित स्तर पर वर्क-फ्रॉम-होम की अनुमति दें।
कोविड-19 काल में केंद्र और राज्यों ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, महामारी रोग अधिनियम, 1897 और अन्य आपात प्रावधानों के तहत जहां संभव हो वहां वर्क-फ्रॉम-होम को अनिवार्य या प्रोत्साहित किया था। गृह मंत्रालय ने उस समय दफ्तरों में भौतिक उपस्थिति कम करने संबंधी परिचालन दिशानिर्देश भी जारी किए थे, लेकिन वे अस्थायी आपात कदम थे, स्थायी श्रम अधिकार नहीं।
यदि ईंधन आपूर्ति, परिवहन व्यवधान या व्यापक ऊर्जा दबाव काफी बढ़ता है, तो सरकारें कुछ क्षेत्रों में फिर से आपात ढांचे के तहत दूरस्थ काम को प्रोत्साहित या अनिवार्य करने पर विचार कर सकती हैं। फिलहाल बढ़ती ऊर्जा लागत और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच यह बहस भारतीय कंपनियों की कार्यस्थल नीतियों, शहरी आवागमन लागत और कर्मचारियों की लचीलेपन संबंधी मांगों को फिर से केंद्र में ला रही है।
हमारी पिछली रिपोर्ट में केंद्र सरकार की चार नई श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद श्रम सुधारों पर बढ़े राजनीतिक टकराव और इनके संभावित प्रभावों पर चर्चा की गई थी। उसमें वेज कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को लेकर नौकरी सुरक्षा, वेतन संरचना, यूनियन अधिकार और सामाजिक सुरक्षा पर उठी चिंताओं को समेटा गया था।
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